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Question
निम्नलिखित अवतरण को पढ़िए और उसके नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर हिन्दी में लिखिए:-
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“आत्म रक्षा का कोई और उपाय न देखकर महाबली दुर्योधन द्वैत वन के सरोवर में घुस गए और उसके जल-स्तंभ में छिपकर बैठे रहे। पर न जाने कैसे पांडवों को इसकी सूचना मिल गई और वे तत्काल रथ पर चढ़कर वहाँ पहुँच गए।” महाभारत की एक साँझ-भारत भूषण अग्रवाल |
- प्रस्तुत कथन के वक्ता एवं श्रोता का संक्षिप्त परिचय दीजिए। [2]
- दुर्योधन स्वयं को दोषी क्यों नहीं मान रहा था तथा युधिष्ठिर को क्या कह रहा था? [2]
- पांडवों को सूचना किसके द्वार प्राप्त हुई? पांडवों ने दुर्योधन को युद्ध के लिए कैसे ललकारा और क्या शर्त रखी? [3]
- ‘महाभारत की एक साँझ’ शीर्षक के औचित्य पर प्रकाश डालिए। [3]
Comprehension
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Solution
- इस अंश के वक्ता संजय हैं, जो नाटक की पृष्ठभूमि तैयार कर रहे हैं। इसके श्रोता धृतराष्ट्र हैं। लेखक यहाँ महाभारत के युद्ध के अंतिम दिन की परिस्थितियों का वर्णन कर रहे हैं, जब दुर्योधन अपनी जान बचाने के लिए द्वैत वन के सरोवर में छिप गया था।
- दुर्योधन का तर्क था कि उसने जो कुछ भी किया, वह एक राजा की महत्वाकांक्षा और राजनीति का हिस्सा था। वह इसे पाप नहीं, बल्कि अधिकार की लड़ाई मानता था। वह युधिष्ठिर को पाखंडी और विनाश का असली कारण कहता था। उसका मानना था कि युधिष्ठिर के झूठे ‘धर्म’ और आधे राज्य की माँग ने ही इस भयंकर नरसंहार की नींव रखी थी।
- पांडवों को दुर्योधन के सरोवर में छिपने की सूचना कुछ व्याधों (शिकारियों/बहेलियों) के माध्यम से प्राप्त हुई थी, जिन्होंने दुर्योधन को सरोवर में प्रवेश करते देखा था। पांडवों (विशेषकर युधिष्ठिर) ने दुर्योधन को कायर कहकर ललकारा और कहा कि एक वीर योद्धा की तरह छिपना उसे शोभा नहीं देता। युधिष्ठिर ने उदारता दिखाते हुए यह शर्त रखी कि दुर्योधन पाँचों पांडवों में से किसी भी एक भाई से अपनी पसंद के शस्त्र से युद्ध कर सकता है। यदि वह उस एक भाई को भी हरा देता है, तो पूरा राज्य उसे वापस मिल जाएगा।
- यह शीर्षक पूरी तरह सार्थक और उचित है क्योंकि यह एकांकी महाभारत के १८वें दिन की अंतिम संध्या की घटनाओं पर आधारित है। ‘साँझ’ न केवल दिन के अंत का, बल्कि कौरव वंश और दुर्योधन के जीवन के अंत का भी प्रतीक है। यह उस युग की समाप्ति को दर्शाता है। यह शीर्षक युद्ध के बाद की उस ‘संध्या’(शांति और चिंतन) को दर्शाता है जहाँ दुर्योधन और युधिष्ठिर के बीच का संवाद केवल शारीरिक युद्ध नहीं, बल्कि एक वैचारिक और मानसिक संघर्ष बन जाता है। यहाँ युद्ध के विनाशकारी परिणामों पर आत्म-मंथन किया गया है।
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