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किन मायनों में सामाजिक अनुबंध की बौद्ध अवधारणा समाज में उस, ब्राह्मणीय दृष्टिकोण से भिन्न थी जो ‘पुरुषसूक्त’ पर आधारित था? - History (इतिहास)

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Question

किन मायनों में सामाजिक अनुबंध की बौद्ध अवधारणा समाज में उस, ब्राह्मणीय दृष्टिकोण से भिन्न थी जो ‘पुरुषसूक्त’ पर आधारित था?

Answer in Brief
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Solution

बौद्धों के अनुसार भारतीय समाज में विषमता मौजूद थी, लेकिन यह भेद न तो नैसर्गिक है और न ही स्थायी है। जो जन्म के आधार पर ब्राह्मण अपने अनेक सूक्तों जैसे ‘पुरुषसूक्त’ में उल्लेख करते हैं, उसे बौद्ध अवधारणा सिरे से खारिज करती है। सामाजिक अनुबंध के बारे में बौद्धों ने समाज में फैली विषमताओं के संदर्भ में एक अलग अवधारणा प्रस्तुत की। साथ ही समाज में फैले अंतर्विरोधों को नियमित करने के लिए जिन संस्थानों की आवश्यकता थी, उस पर भी अपना दृष्टिकोण सामने रखा।

सूत्तपिटक नामक ग्रंथ में एक मिथक वर्णित है-“वनस्पति जगत् भी अविकसित था। सभी जीव शांति के एक निर्बाध लोक में रहते थे और प्रकृति से उतना ही ग्रहण करते थे जितनी एक समय के भोजन की आवश्यकता होती है। किंतु यह व्यवस्था क्रमशः पतनशील हुई। मनुष्य अधिकाधिक लालची, प्रतिहिंसक और कपटी हो गए। ‘कर’ वह मूल्य था जो लोग राजा की सेवा के बदले उसे देते थे।” यह मिथक इस बात को भी दर्शाता है कि आर्थिक और सामाजिक संबंधों को बनाने में मानवीय कर्म का बड़ा हाथ था। इस तथ्य के कुछ और आशय भी हैं। उदाहरणत: यदि मनुष्य स्वयं एक प्रणाली को बनाए रखने के लिए जिम्मेदार थे तो भविष्य में उसमें परिवर्तन भी ला सकते थे।

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सामाजिक विषमताएँ वर्ण व्यवस्था के दायरे में और उससे परे
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