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इस कविता को एकांकी में बदलिए और उसका अभिनय कीजिए।

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Question

इस कविता को एकांकी में बदलिए और उसका अभिनय कीजिए।

Answer in Brief
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Solution

‘सुदामा चरित’ नामक कविता का एकांकी में रूपांतरण
[द्वारकापुरी, धन-धान्य, वैभव, समृधि एवं खुशहाली से भरी नगरी, वहाँ बने आलीशान एवं भव्य राजप्रासाद चारों ओर प्रसन्नता एवं शांतिमय वातावरण इन्हीं प्रासादों के बीच स्थित द्वारिकाधीश श्रीकृष्ण का भवन भवन के बाहर खड़े पहरेदार और द्वारपालऐसे में दीन-हीन सुदामा श्रीकृष्ण के भवन के सामने पहुँचते हैंउनके सिर पर न पगड़ी है और न शरीर पर कुर्ताधोती जगह-जगह से फटी तथा धूल-धूसरित पैर लिए वे द्वारपाल के पास जाते हैं।]

सुदामा – (द्वारपाल से पूछते हुए) अरे भाई द्वारपाल, क्या तुम बता सकते हो कि दुद्वारका के राजा श्रीकृष्ण का राजभवन यहाँ कौन-सा है?
द्वारपाल – क्या नाम है तुम्हारा? कहाँ से आए हो?
सुदामा – सुदामा बहुत दूर गाँव से आया हूँ, पर तुमने उनका भवन तो बताया नहीं
द्वारपाल – द्वारकाधीश प्रभु श्रीकृष्ण का भवन तो यही है
सुदामा – अपने प्रभु श्रीकृष्ण से कह दो कि उनसे मिलने सुदामा आया है।
द्वारपाल – तुम यहीं ठहरो। मैं अंदर जाकर सूचना देता हूँ। और हाँ, अंदर मत आना, मेरे आने तक। [द्वारपाल कृष्ण के पास चला जाता है।]
द्वारपाल – महाराज की जय हो। प्रभु आपसे मिलने कोई आया है।
श्रीकृष्ण – कहाँ है वह व्यक्ति? कैसा है तथा क्या नाम है उसका?
द्वारपाल – प्रभु वह दरवाजे के बाहर खड़ा है। उसके सिर पर न पगड़ी है और न शरीर पर कुर्ता। पैरों में जूते नहीं हैं? वह दुर्बल ब्राह्मण अपना नाम सुदामा बता रहा है। [सुदामा नाम सुनते ही कृष्ण राज सिंहासन छोड़कर आते हैं। और सुदामा को महल के अंदर ले जाते हैं। उन्हें सिंहासन पर बिठाकर उनके पैर धोने के लिए पानी मँगवाते हैं और सुदामा के पैर धोना चाहते हैं।]
श्रीकृष्ण – मित्र सुदामा तुम इतनी गरीबी सहकर कष्ट भोगते रहे पर तुम पहले ही यहाँ क्यों नहीं आ गए? [सुदामा संकोच वश कोई जवाब नहीं देते हैं। वे अपनी पत्नी द्वारा भेजे गए चावलों की पोटली को काँख के नीचे छिपाने का प्रयास करते हैं, जिसे कृष्ण देख लेते हैं।]

श्रीकृष्ण – मित्र तुम मुझसे कुछ छिपाने की कोशिश कर रहे हो। [कृष्ण वह पोटली छीन लेते हैं।] अरे! तुम भाभी के भेजे चावल मुझसे छिपा रहे थे। मित्र चोरी की आदत में तो तुम पहले से ही बड़े कुशल हो। [ऐसा कहकर श्रीकृष्ण उसमें से कुछ चावल खा लेते हैं। सुदामा उनके यहाँ कुछ दिन बिताकर अपने गाँव वापस विदा होते हैं। श्रीकृष्ण उन्हें प्रत्यक्ष में कुछ नहीं देते हैं जिससे सुदामा श्रीकृष्ण पर खीझते हुए वापस आते हैं।]
सुदामा – [अपने-आप से] कृष्ण तो दिखावे के लिए कितना आदर
सत्कार करता रहा पर आते समय कुछ भी नहीं दिया। यह भी नहीं सोचा कि ब्राह्मण को खाली हाथ विदा नहीं करते हैं। अरे, यह वही कृष्ण है जो जरा-सी दही के लिए हाथ फैलाए फिरता था। यह मुझे क्या देगा। अब अपनी पत्नी से चलकर कहूँगा कि खूब सारा धन सँभालकर रख लो। मैं तो इसीलिएआना ही नहीं चाहता था। [यही सोचते सुदामा अपने गाँव पहुँच जाते हैं।]
सुदामा – अरे यहाँ तो सारे भवन तथा सब कुछ द्वारका जैसा ही है। कहीं मैं रास्ता भूलकर वापस पुन: द्वारका तो नहीं आ गया। मैं तौ भ्रमित हो गया हूँ।
सुदामा – [गाँव के एक व्यक्ति से] क्या तुम बता सकते हो कि यहीं सुदामा नामक गरीब ब्राह्मण की झोंपड़ी हुआ करती थी, वह कहाँ है?
कोई व्यक्ति – अरे तुम सुदामा के राजमहल के सामने ही तो खड़े हो। उनकी झोंपड़ी की जगह यह राजमहल बन गया है। (इशारा करते हुए) वह देखो अंदर। उनकी पत्नी रानियों के परिधान में खड़ी हैं।
सुदामा – [अपनी-पत्नी को पहचानते हैं और अंदर जाते हैं।] अपने मित्र की महिमा से मैं कितना अंजान था। अब सब समझ गया।

छात्र एकांकी का अभिनय स्वयं करें।

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पद्य (Poetry) (Class 8)
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Chapter 12: सुदामा चरित - कुछ करने को [Page 73]

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NCERT Hindi - Vasant Part 3 Class 8
Chapter 12 सुदामा चरित
कुछ करने को | Q 1 | Page 73

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