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Question
हमारे देश और विश्व में अनेक कहानियाँ लोग एक-दूसरे को सैकड़ों-हजारों सालों से सुनते-सुनाते रहे हैं। इन कहानियों को लोककथाएँ कहते हैं। अपने घर या आस-पास सुनी-सुनाई जाने वाली किसी लोककथा को लिखकर कक्षा में सुनाइए। आपने जिस भाषा में लोककथा सुनी है या जिस भाषा में आप लोककथा लिखना चाहें, लिख सकते हैं। कक्षा के सभी समूहों द्वारा एकत्रित लोककथाओं को जोड़कर एक पुस्तिका बनाइए और कक्षा के पुस्तकालय में उसे सम्मिलित कीजिए।
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Solution
ईमानदार लकड़हारा
मेरी नानी ने मुझे यह लोककथा सुनाई थी। मैं उसे अपनी कक्षा में सुनाना चाहता/चाहती हूँ।
एक समय की बात है, एक गाँव में एक गरीब लकड़हारा रहता था। वह रोज़ जंगल से लकड़ी काटकर बेचता था और उसी से अपने परिवार का गुज़ारा चलाता था। वह बहुत ईमानदार था।
एक दिन वह नदी के किनारे पेड़ काट रहा था। तभी उसकी कुल्हाड़ी फिसलकर नदी में गिर गई। नदी बहुत गहरी थी, इसलिए वह कुल्हाड़ी निकाल नहीं पाया। वह रोने लगा, क्योंकि कुल्हाड़ी के बिना वह काम नहीं कर पाता।
तभी नदी से एक जलपरी निकली। उसने पूछा, ‘क्यों रो रहे हो?’ लकड़हारे ने सारी बात बताई। जलपरी पानी में डुबकी लगाकर सोने की कुल्हाड़ी लाई। लकड़हारे ने कहा, ‘नहीं, यह मेरी नहीं है।’ फिर परी चाँदी की कुल्हाड़ी लाई। लकड़हारे ने फिर कहा, ‘यह भी मेरी नहीं है।’ तब परी उसकी लोहे की कुल्हाड़ी लाई। लकड़हारा खुशी से बोला, 'हाँ, यही मेरी कुल्हाड़ी है।'
जलपरी उसकी ईमानदारी से बहुत प्रसन्न हुई। उसने तीनों कुल्हाड़ियाँ लकड़हारे को देकर उसे विदा किया।
शिक्षा: इस लोककथा से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें हर हाल में ईमानदार रहना चाहिए, क्योंकि ईमानदारी का फल हमेशा अच्छा मिलता है।
पुस्तिका बनाने की विधि: कक्षा के सभी समूह अपनी-अपनी लोककथाएँ साफ़-साफ़ लिखकर लाएँगे। फिर सभी कहानियों को क्रम से जोड़ा जाएगा। एक सुंदर शीर्षक-पृष्ठ बनाकर, जिसमें सभी बच्चों के नाम लिखे होंगे, पुस्तिका तैयार की जाएगी। उसका नाम 'लोककथाओं का संग्रह' रखा जा सकता है। यह पुस्तिका कक्षा के पुस्तकालय में रखी जाएगी ताकि सभी बच्चे इसे पढ़कर आनंद ले सकें।
