Advertisements
Advertisements
प्रश्न
निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए-
‘रूप व्यक्ति-सत्य है, नाम समाज-सत्य। नाम उस पद को कहते हैं जिस पर समाज की मुहर लगी होती है। आधुनिक शिक्षित लोग जिसे ‘सोशल सैक्शन’ कहा करते हैं। मेरा मन नाम के लिए व्याकुल है, समाज द्वारा स्वीकृत, इतिहास द्वारा प्रमाणित, समष्टि-मानव की चित्त-गंगा में स्नात!’
Advertisements
उत्तर
प्रसंग: प्रस्तुत पंक्तियाँ हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित निबंध “कुटज” से ली गई हैं। इस निबंध में लेखक ने कुटज वृक्ष की विशेषताओं का वर्णन किया है। लेखक ने कुटज वृक्ष की तुलना मनुष्य के जीवन से की है।
व्याख्या: इन पंक्तियों में लेखक ने नाम के महत्व का वर्णन किया है। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में नाम का अत्यंत महत्व होता है। किसी व्यक्ति की पहचान उसके नाम से ही होती है। चाहे कोई हमें किसी व्यक्ति के रंग-रूप और आकार के बारे में कितना भी बता दे, लेकिन जब तक हमें उसका नाम ज्ञात न हो, हम उसे ठीक से समझ नहीं पाते। नाम ही व्यक्ति की पहचान है और उसी से उसकी पहचान स्थापित होती है। संसार में प्रत्येक जीव और वस्तु के लिए एक निश्चित नाम निर्धारित किया गया है। प्रत्येक का अपना अस्तित्व होता है और उसकी पहचान करना आवश्यक होता है। लेखक कहते हैं कि उनके मन में नाम के अर्थ को जानने की तीव्र इच्छा है और वे इसके लिए व्याकुल हैं।
APPEARS IN
संबंधित प्रश्न
‘नाम’ क्यों बड़ा है? लेखक के विचार अपने शब्दों में लिखिए।
‘कुट’, ‘कुटज’ और ‘कुटनी’ शब्दों का विश्लेषण कर उनमें आपसी संबंध स्थापित कीजिए।
कुटज किस प्रकार अपनी अपराजेय जीवनी-शक्ति की घोषणा करता है?
‘कुटज’ हम सभी को क्या उपदेश देता है? टिप्पणी कीजिए।
कुटज के जीवन से हमें क्या सीख मिलती है?
कुटज क्या केवल जी रहा है - लेखक ने यह प्रश्न उठाकर किन मानवीय कमज़ोरियों पर टिप्पणी की है?
निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए-
‘कभी-कभी जो लोग ऊपर से बेहया दिखते हैं, उनकी जड़ें काफ़ी गहरी पैठी रहती हैं। ये भी पाषाण की छाती फाड़कर न जाने किस अतल गह्हर से अपना भोग्य खींच लाते हैं।’
निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए-
‘रूप की तो बात ही क्या है! बलिहारी है इस मादक शोभा की। चारों ओर कुपित यमराज के दारुण निःश्वास के समान धधकती लू में यह हरा भी है और भरा भी है, दुर्जन के चित्त से भी अधिक कठोर पाषाण की कारा में रुद्ध अज्ञात जलस्रोत से बरबस रस खींचकर सरस बना हुआ है।’
निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए-
‘हृदयेनापराजितः! कितना विशाल वह हृदय होगा जो सुख से, दुख से, प्रिय से, अप्रिय से विचलित न होता होगा! कुटज को देखकर रोमांच हो आता है। कहाँ से मिलती है यह अकुतोभया वृत्ति, अपराजित स्वभाव, अविचल जीवन दृष्टि!’
कुटज को ‘गाढ़े का साथी’ क्यों कहा गया है?
