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‘कुटज’ पाठ के आधार पर सिद्ध कीजिए कि ‘दुख और सुख तो मन के विकल्प हैं।’

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प्रश्न

‘कुटज’ पाठ के आधार पर सिद्ध कीजिए कि ‘दुख और सुख तो मन के विकल्प हैं।’
दीर्घउत्तर
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उत्तर

लेखक ने सुख-दुख को मानव मन की अवस्था का विकल्प बताया है। मनुष्य जीवनभर सुख और दुःख के बीच ही जीता है। जिसका मन नियंत्रित रहता है, वह स्वयं को सुखी मानता है। जिसका मन पर नियंत्रण नहीं होता, वह स्वयं को निरंतर दुखी अनुभव करता रहता है। पाठ में ‘कुटज’ नामक पौधा कठिन परिस्थितियों में भी जीवित रहता है। उसने किसी अवधूत की तरह अपने मन पर विजय प्राप्त कर ली है। वह अपनी शर्तों पर जीवन जीता है। उसका मन किसी के अधीन नहीं है। उसमें आत्मविश्वास और अपराजेय जीवन-शक्ति विद्यमान हैं, जिसके कारण वह सुखी रहता है। मनुष्य भी इन्हीं गुणों को अपनाकर सुखी बन सकता है।

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कुटज
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पाठ 2.08: हजारी प्रसाद द्विवेदी (कुटज) - प्रश्न-अभ्यास [पृष्ठ १३७]

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एनसीईआरटी Hindi Antara Bhag 2 [English] Class 12
पाठ 2.08 हजारी प्रसाद द्विवेदी (कुटज)
प्रश्न-अभ्यास | Q 9. | पृष्ठ १३७

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‘नाम’ क्यों बड़ा है? लेखक के विचार अपने शब्दों में लिखिए।


‘कुट’, ‘कुटज’ और ‘कुटनी’ शब्दों का विश्लेषण कर उनमें आपसी संबंध स्थापित कीजिए।


कुटज किस प्रकार अपनी अपराजेय जीवनी-शक्ति की घोषणा करता है?


‘कुटज’ हम सभी को क्या उपदेश देता है? टिप्पणी कीजिए।


कुटज के जीवन से हमें क्या सीख मिलती है?


कुटज क्या केवल जी रहा है - लेखक ने यह प्रश्न उठाकर किन मानवीय कमज़ोरियों पर टिप्पणी की है?


लेखक क्यों मानता है कि स्वार्थ से भी बढ़कर जिजीविषा से भी प्रचंड कोई न कोई शक्ति अवश्य है? उदाहरण सहित उत्तर दीजिए।

निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए-

‘कभी-कभी जो लोग ऊपर से बेहया दिखते हैं, उनकी जड़ें काफ़ी गहरी पैठी रहती हैं। ये भी पाषाण की छाती फाड़कर न जाने किस अतल गह्हर से अपना भोग्य खींच लाते हैं।’


निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए-

‘रूप व्यक्ति-सत्य है, नाम समाज-सत्य। नाम उस पद को कहते हैं जिस पर समाज की मुहर लगी होती है। आधुनिक शिक्षित लोग जिसे ‘सोशल सैक्शन’ कहा करते हैं। मेरा मन नाम के लिए व्याकुल है, समाज द्वारा स्वीकृत, इतिहास द्वारा प्रमाणित, समष्टि-मानव की चित्त-गंगा में स्नात!’


निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए-

‘रूप की तो बात ही क्या है! बलिहारी है इस मादक शोभा की। चारों ओर कुपित यमराज के दारुण निःश्वास के समान धधकती लू में यह हरा भी है और भरा भी है, दुर्जन के चित्त से भी अधिक कठोर पाषाण की कारा में रुद्ध अज्ञात जलस्रोत से बरबस रस खींचकर सरस बना हुआ है।’


निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए-

‘हृदयेनापराजितः! कितना विशाल वह हृदय होगा जो सुख से, दुख से, प्रिय से, अप्रिय से विचलित न होता होगा! कुटज को देखकर रोमांच हो आता है। कहाँ से मिलती है यह अकुतोभया वृत्ति, अपराजित स्वभाव, अविचल जीवन दृष्टि!’


कुटज को ‘गाढ़े का साथी’ क्यों कहा गया है?


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