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प्रश्न
निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए-
‘हृदयेनापराजितः! कितना विशाल वह हृदय होगा जो सुख से, दुख से, प्रिय से, अप्रिय से विचलित न होता होगा! कुटज को देखकर रोमांच हो आता है। कहाँ से मिलती है यह अकुतोभया वृत्ति, अपराजित स्वभाव, अविचल जीवन दृष्टि!’
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उत्तर
प्रसंग: प्रस्तुत पंक्तियाँ हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित निबंध “कुटज” से ली गई हैं। इस निबंध में लेखक ने कुटज की विशेषताओं का वर्णन किया है।
व्याख्या: इन पंक्तियों में लेखक ने कुटज की सुंदरता के बारे में बताया है। लेखक यह भी कहते हैं कि हमें किसी भी कठिन परिस्थिति में हार नहीं माननी चाहिए, बल्कि उसका डटकर सामना करना चाहिए। हमें हर स्थिति में धैर्यवान बने रहना चाहिए। अपनी मेहनत और शक्ति से हमें हर कार्य को पूरा करने का प्रयास करना चाहिए। यदि हम लगातार प्रयास करते रहें तो कठिन से कठिन परिस्थितियाँ भी हमारे सामने झुक जाएँगी। प्रतिकूल परिस्थितियों में उभरकर आने वाला व्यक्ति सोने की तरह चमकता है। जो व्यक्ति भयंकर परिस्थितियों को भी पार कर प्रसन्न रह सकता है, उसे जीवन में कोई भी पराजित नहीं कर सकता।
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