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प्रश्न
मीठी वाणी/बोली संबंधी व ईश्वर प्रेम संबंधी दोहों का संकलन कर चार्ट पर लिखकर भित्ति पत्रिका पर लगाइए।
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उत्तर
कबीर के दोहे
- मीठी वाणी/बोली संबंधी दोहा
ऐसी बानी बोलिये, मन का आपा खोइ।
अपना तन सीतल करै, औरन को सुख होइ॥
भावार्थ: हमें अहंकार छोड़कर मधुर और विनम्र वाणी बोलनी चाहिए। मीठी वाणी बोलने से स्वयं को शांति मिलती है और दूसरों को भी सुख प्राप्त होता है। - ईश्वर-प्रेम संबंधी दोहे
कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढै बन माँहि।
ऐसे घटि-घटि राम हैं, दुनिया देखै नाँहिं॥
भावार्थ: जिस प्रकार हिरण की नाभि में कस तूरी होती है, फिर भी वह उसे वन में खोजता है, उसी प्रकार ईश्वर प्रत्येक प्राणी के हृदय में विद्यमान हैं, परंतु मनुष्य उन्हें बाहर खोजता रहता है।
जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाँहिं।
सब अँधियारा मिटि गया, जब दीपक देख्या माँहि॥
भावार्थ: जब तक मनुष्य में अहंकार रहता है, तब तक उसे ईश्वर का अनुभव नहीं होता। अहंकार मिटते ही ईश्वर का ज्ञानरूपी प्रकाश प्राप्त हो जाता है।
बिरह भुवंगम तन बसै, मंत्र न लागै कोइ।
राम बियोगी ना जिवै, जिवै तो बौरा होइ॥
भावार्थ: ईश्वर-वियोग का दुख साँप के विष के समान होता है। राम से छुड़ा भक्त न तो सुखपूर्वक जीवित रह सकता है और यदि जीवित रहता है, तो विरह में व्याकुल रहता है।
चार्ट के लिए शीर्षक:
“कबीर के दोहों में मधुर वाणी और ईश्वर-प्रेम”
संदेश: मधुर वाणी बोलें, अहंकार त्यागें और ईश्वर को अपने अंतर्मन में खोजें।
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