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प्रश्न
लेखिका की अपने पिता से वैचारिक टकराहट को अपने शब्दों में लिखिए।
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उत्तर
लेखिका और उनके पिता के बीच अक्सर विचारों का टकराव होता था। पिता स्त्रियों की शिक्षा के विरोधी तो नहीं थे, लेकिन उन्हें घर की चारदीवारी तक सीमित रखना चाहते थे, जबकि लेखिका खुले विचारों वाली थीं। पिता जल्दी विवाह कराने के पक्षधर थे, पर लेखिका अपनी आकांक्षाओं को पूरा करना चाहती थी। स्वतंत्रता संग्राम में उनकी सक्रियता और भाषण देना पिता को पसंद नहीं था। माँ के साथ पिता का व्यवहार भी लेखिका को अनुचित लगता था। साथ ही, बचपन में उनके रंगरूप के कारण पिता का उदासीन रवैया भी लेखिका को खटकता था।
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| यों खेलने को हमने भाइयों के साथ गिल्ली-डंडा भी खेला और पतंग उड़ाने, काँच पीसकर माँजा सूतने का काम भी किया, लेकिन उनकी गतिविधियों का दायरा घर के बाहर ही अधिक रहता था और हमारी सीमा थी घर। हाँ, इतना जरूर था कि उस जमाने में घर की दीवारें घर तक ही समाप्त नहीं हो जाती थीं बल्कि पूरे मोहल्ले तक फैली रहती थीं इसलिए मोहल्ले के किसी भी घर में जाने पर कोई पाबंदी नहीं थी, बल्कि कुछ घर तो परिवार का हिस्सा ही थे। आज तो मुझे बड़ी शिद्दत के साथ यह महसूस होता है कि अपनी ज़िंदगी खुद जीने के इस आधुनिक दबाव ने महानगरों के फ़्लैट में रहने वालों को हमारे इस परंपरागत 'पड़ोस-कल्चर' से विच्छिन्न करके हमें कितना संकुचित, असहाय और असुरक्षित बना दिया है। मेरी कम-से-कम एक दर्जन आरंभिक कहानियों के पात्र इसी मोहल्ले के हैं जहाँ मैंने अपनी किशोरावस्था गुज़ार अपनी युवावस्था का आरंभ किया था। एक-दो को छोड़कर उनमें से कोई भी पात्र मेरे परिवार का नहीं है। बस इनको देखते-सुनते, इनके बीच ही मैं बड़ी हुई थी लेकिन इनकी छाप मेरे मन पर कितनी गहरी थी, इस बात का अहसास तो मुझे कहानियाँ लिखते समय हुआ। इतने वर्षों के अंतराल ने भी उनकी भाव-भंगिमा, भाषा, किसी को भी धुँधला नहीं किया था और बिना किसी विशेष प्रयास के बड़े सहज भाव से वे उतरते चले गए थे। |
- भाइयों की गतिविधियों का दायरा घर के बाहर रहने और बहनों की सीमा घर होने का क्या अभिप्राय है?
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