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जाति प्रथा को श्रम-विभाजन का ही एक रूप न मानने के पीछे आंबेडकर के क्या तर्क हैं?

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प्रश्न

जाति प्रथा को श्रम-विभाजन का ही एक रूप न मानने के पीछे आंबेडकर के क्या तर्क हैं?

सविस्तर उत्तर
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उत्तर

जाति-प्रथा को श्रम-विभाजन का केवल एक रूप मानने के विचार को आंबेडकर निम्नलिखित कारणों से अस्वीकार करते हैं-

  1. जाति-प्रथा केवल श्रम-विभाजन ही नहीं, बल्कि श्रमिकों का भी विभाजन कर देती है।
  2. यद्यपि श्रम-विभाजन एक सभ्य समाज की आवश्यकता है, लेकिन किसी भी सभ्य समाज में यह व्यवस्था श्रमिकों को अलग-अलग वर्गों में स्वाभाविक रूप से विभाजित नहीं करती।
  3. भारत की जाति-प्रथा न केवल श्रमिकों को अस्वाभाविक रूप से विभाजित करती है, बल्कि उन वर्गों के बीच ऊँच-नीच की भावना भी पैदा करती है, जो विश्व के किसी अन्य समाज में सामान्य रूप से नहीं पाई जाती।
  4. यदि जाति-प्रथा को श्रम-विभाजन माना भी जाए, तो यह प्राकृतिक विभाजन नहीं है क्योंकि यह व्यक्ति की रुचि और योग्यता पर आधारित नहीं होती।
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श्रम विभाजन और जाति-प्रथा
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पाठ 15: बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर (श्रम विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज) - अभ्यास [पृष्ठ १२६]

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एनसीईआरटी Hindi Aaroh Bhag 2 [English] Class 12
पाठ 15 बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर (श्रम विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज)
अभ्यास | Q 1. | पृष्ठ १२६

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