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प्रश्न
जाति प्रथा को श्रम-विभाजन का ही एक रूप न मानने के पीछे आंबेडकर के क्या तर्क हैं?
विस्तार में उत्तर
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उत्तर
जाति-प्रथा को श्रम-विभाजन का केवल एक रूप मानने के विचार को आंबेडकर निम्नलिखित कारणों से अस्वीकार करते हैं-
- जाति-प्रथा केवल श्रम-विभाजन ही नहीं, बल्कि श्रमिकों का भी विभाजन कर देती है।
- यद्यपि श्रम-विभाजन एक सभ्य समाज की आवश्यकता है, लेकिन किसी भी सभ्य समाज में यह व्यवस्था श्रमिकों को अलग-अलग वर्गों में स्वाभाविक रूप से विभाजित नहीं करती।
- भारत की जाति-प्रथा न केवल श्रमिकों को अस्वाभाविक रूप से विभाजित करती है, बल्कि उन वर्गों के बीच ऊँच-नीच की भावना भी पैदा करती है, जो विश्व के किसी अन्य समाज में सामान्य रूप से नहीं पाई जाती।
- यदि जाति-प्रथा को श्रम-विभाजन माना भी जाए, तो यह प्राकृतिक विभाजन नहीं है क्योंकि यह व्यक्ति की रुचि और योग्यता पर आधारित नहीं होती।
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श्रम विभाजन और जाति-प्रथा
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