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शारीरिक वंश-परंपरा और सामाजिक उत्तराधिकार की दृष्टि से मनुष्यों में असमानता संभावित रहने के बावजूद आंबेडकर ‘समता’ के एक व्यवहार्य सिद्धांत मानने का आग्रह क्यों करते हैं? इसके पीछे

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प्रश्न

शारीरिक वंश-परंपरा और सामाजिक उत्तराधिकार की दृष्टि से मनुष्यों में असमानता संभावित रहने के बावजूद आंबेडकर ‘समता’ के एक व्यवहार्य सिद्धांत मानने का आग्रह क्यों करते हैं? इसके पीछे उनके क्या तर्क हैं?
दीर्घउत्तर
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उत्तर

हर व्यक्ति को समाज में समान अधिकार प्राप्त होने चाहिए, चाहे वह किसी भी जाति या धर्म से संबंधित हो। सभी के साथ समान व्यवहार करना ही एक आदर्श समाज की पहचान है और इससे समाज अधिक बेहतर बनता है। आंबेडकर के विचारों के अनुसार, समाज में भले ही आर्थिक रूप से असमानता हो, लेकिन इसके आधार पर लोगों में भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति के साथ समान व्यवहार करना एक सामान्य और आवश्यक मानवीय सिद्धांत है। सभी को समान शिक्षा का अधिकार मिलना चाहिए ताकि वे अपनी क्षमता का विकास कर सकें। साथ ही, हर व्यक्ति को अपनी पसंद का व्यवसाय चुनने की स्वतंत्रता भी होनी चाहिए।

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श्रम विभाजन और जाति-प्रथा
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अध्याय 15: बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर (श्रम विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज) - अभ्यास [पृष्ठ १२६]

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एनसीईआरटी Hindi Aaroh Bhag 2 [English] Class 12
अध्याय 15 बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर (श्रम विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज)
अभ्यास | Q 4. | पृष्ठ १२६

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