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‘एक फूल की चाह’ एक कथात्मक कविता है। इसकी कहानी को संक्षेप में लिखिए।

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प्रश्न

‘एक फूल की चाह’ एक कथात्मक कविता है। इसकी कहानी को संक्षेप में लिखिए।

थोडक्यात उत्तर
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उत्तर

चारों ओर भीषण महामारी फैली हुई थी। कितने ही लोग इसकी चपेट में आ चुके थे। सब ओर हाहाकार मचा हुआ था। बच्चों की मृत्यु पर शोक प्रकट करती माताओं का करुण क्रंदने हृदय को दहला देता था।
सुखिया के पिता को भय था कि कहीं उसकी नन्हीं बेटी भी महामारी की चपेट में न आ जाए। वह उसे बहुत रोकता था कि बाहर न जाए। घर में ही टिककर बैठे। परंतु वह बहुत नटखट और चंचल थी। आखिरकार एक दिन उसका भय सच्चाई में बदल गया। वह महामारी के प्रभाव में आ ही गई। उसका नन्हा शरीर ज्वरग्रस्त हो गया। वह बिस्तर पर लेट गई। एक दिन वह पिता से बोली कि मुझे देवी माँ के मंदिर के प्रसाद का एक फूल लाकर दो। पिता सिर झुकाए बैठा रहा। वह जानता था। कि वह अछूत है। उसे मंदिर में घुसने नहीं दिया जाएगा। इसलिए वह सिर नीचा करके बैठी रहा और उसे बचाने के अन्य उपाय सोचता रहा

इसी उधेड़बुन में सुबह से दोपहर और शाम हो गई। चारों ओर गहरा अँधेरा छा गया। उसे लगा कि यह महातिमिर उसकी बेटी को निगल जाएगा। सुखिया की आँखें झुलसने लगीं। | सुखिया के पिता ने बेटी को बचाने के लिए मंदिर में जाने का निश्चय किया। वह मंदिर में पहुँचा। मंदिर पहाड़ी पर था। मंदिर के अंदर उत्सव-सा चल रहा था। भक्त लोग ज़ोर-ज़ोर से ‘पतित तारिणी’, ‘पाप हारिणी’ की जय-जयकार कर रहे थे। वह भी भक्तों की भीड़ में पहुँच गया। उसने पुजारी को दीप-फूल दिए। पुजारी ने उसे पूजा के फूल प्रदान किए। फूल को पाकर वह खुशी से फूला न समाया। उसे लगा मानो इससे सुखिया को नया जीवन मिल जाएगा। अतः उत्साह में वह पुजारी से प्रसाद लेना भूल गया।

इस घटना से पुजारी ने उसे पहचान लिया। उसने शोर मचाया। वहाँ उपस्थित भक्तों ने सुखिया के पिता को पकड़ लिया। वे उस पर आरोप लगाने लगे। कहने लगे कि यह धूर्त है। यह साफ सुथरे कपड़े पहनकर हमको धोखा देना चाहता है। इस अछूत ने मंदिर की पवित्रता नष्ट कर दी है। इसे पकड़ो।
सुखिया के पिता ने उनसे पूछा-‘क्या मेरा कलुष देवी की महिमा से भी अधिक बड़ा है? मैं माता की महिमा के आगे क़हाँ ठहर सकता हूँ।’ परंतु भक्तों ने उसकी एक न सुनी। उन्होंने उसे मार-मारकर जमीन पर गिरा दिया। उसके हाथों का प्रसाद भी धरती पर बिखर गया।

वे भक्तगण सुखिया के पिता को न्यायालय में ले गए। न्यायालय ने उसे सात दिनों की सज़ा सुनाई। उस पर आरोप यह था कि उसने मंदिर की पवित्रता नष्ट की है। सुखिया के पिता ने मौन होकर दंड को स्वीकार कर लिया। वे सात दिन उसके लिए सैकड़ों वर्षों के समान भारी थे। उसकी आँखें निरंतर बहती रहीं, फिर भी दुख कम न हो सका।:
जब सात दिन बीते। सुखिया का पिता जेल से छूटा। वह मरे हुए मन से घर की ओर चला। उसे पता चला कि सुखिया मर चुकी है। वह श्मशान की ओर भागा। परंतु वहाँ सुखिया की चिता ठंडी पड़ी थी। उसकी कोमल बच्ची राख की ढेरी बन चुकी थी। वह रो-रोकर पछताने लगा कि वह बच्ची के अंतिम समय में भी उसे गोद में न ले सका।

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पद्य (Poetry) (Class 9 B)
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पाठ 10: सियारामशरण गुप्त - एक फूल की चाह - योग्यता विस्तार [पृष्ठ ९६]

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एनसीईआरटी Hindi Sparsh Bhag 1 Class 9
पाठ 10 सियारामशरण गुप्त - एक फूल की चाह
योग्यता विस्तार | Q 1 | पृष्ठ ९६

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