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प्रश्न
गैसों के विनिमय के लिए मानव-फुफ्फुस में अधिकतम क्षेत्रफल को कैसे अभिकल्पित किया है?
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उत्तर
फुफफस के अंदर लाखों कूपिका होते हैं जो एक सतह उपलब्ध कराती है जिससे गैसों का विनिमय हो सकता है। कूपिकाओं की भित्ति में रुघिर वाहिकाओं का विस्तीर्ण जाल होता है। जब हम श्वास अंदर लेते हैं, हमारी पसलियाँ ऊपर उठती हैं और हमारा डायाफ्राम चपटा हो जाता है, इसके परिणामस्वरूप वक्षगुहिका बड़ी हो जाती है। इस कारण वायु फुफ्फुस के अंदर चूस ली जाती है। सांस से आने वाली ऑक्सीजन रक्त में प्रसारित हो जाती है और शरीर से लाया गया CO2 रक्त से हवा में प्रसारित हो जाता है।
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- अंतः श्वसन के दौरानपसलियाँ भीतर की तरफ़ चली जाती हैं और डायफ्राम ऊपर की तरफ उठ जाता है।
- कूपिकाओं के भीतर, गैसों का विनिमय होता है अर्थात् कूपिकाओं की वायु की ऑक्सीजन विसरित होकर रुधिर में पहुँच जाती है और रुधिर की कार्बन डाइऑक्साइड विसरित होकर कूपिकाओं की वायु में चली जाती है।
- हीमोग्लोबिन में ऑक्सीजन की अपेक्षा कार्बन डाइऑक्साइड के प्रति अधिक बंधुता होती है।
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