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प्रश्न
धूत कहौ... वाले छंद में ऊपर से सरल व निरीह दिखलाई पड़ने वाले तुलसी की भीतरी असलियत एक स्वाभिमानी भक्त हृदय की है। इससे आप कहाँ तक सहमत हैं?
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उत्तर
तुलसीदास जी आदर्शवादी विचारधारा के कवि थे। उनके व्यक्तित्व में बचपन से ही गहरा आत्मसम्मान और स्वाभिमान विद्यमान था। वे भगवान राम के अनन्य भक्त थे और पूर्ण निष्ठा के साथ उनकी भक्ति में समर्पित रहे। उन्होंने किसी भी परिस्थिति में अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं किया तथा जीवनभर एकाग्र भाव से राम की उपासना करते रहे। समाज द्वारा किए गए तानों और आलोचनाओं का उन पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा। उनका जीवन अनेक कठिनाइयों और भटकावों से भरा रहा, फिर भी वे किसी पर निर्भर नहीं हुए और न ही किसी प्रकार के लेन-देन के संबंधों में पड़े। उन्होंने समाज में व्याप्त जाति-पाति और धार्मिक रूढ़ियों का साहसपूर्वक विरोध किया। बाहरी रूप से वे अत्यंत सरल, विनम्र और सहज दिखाई देते थे, किंतु उनके भीतर एक दृढ़ स्वाभिमानी और समर्पित भक्त का हृदय विद्यमान था।
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कवितावली में उद्धृत छंदों के आधार पर स्पष्ट करें कि तुलसीदास को अपने युग की आर्थिक विषमता की अच्छी समझ है।
तुलसी ने यह कहने की ज़रूरत क्यों समझी?
धूत कहौ, अवधूत कहौ, रजपूतु कहौ, जोलहा कहौ कोऊ/काहू की बेटीसों बेटा न ब्याहब, काहूकी जाति बिगार न सोऊ। इस सवैया में काहू के बेटासों बेटी न ब्याहब कहते तो सामाजिक अर्थ में क्या परिवर्तन आता?
व्याख्या करें-
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व्याख्या करें-
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‘कवितावली’ के आधार पर सिद्ध कीजिए कि तुलसीदास को अपने समय की आर्थिक-सामाजिक समस्याओं की समझ थी।
