Advertisements
Advertisements
प्रश्न
बात और भाषा परस्पर जुड़े होते हैं, किंतु कभी-कभी भाषा के चक्कर में ‘सीधी बात भी टेढ़ी हो जाती है’ कैसे?
Advertisements
उत्तर
बात और भाषा आपस में जुड़ी होती हैं, लेकिन कई बार भाषा के कारण सीधी बात भी जटिल हो जाती है। इसका कारण उपयुक्त शब्दों का सही प्रयोग न करना है। मनुष्य अपनी भाषा को कठिन और आडंबरपूर्ण बनाकर चमत्कारी शब्दों के प्रयोग में अपनी श्रेष्ठता समझता है, जिससे वह अपनी मूल बात को स्पष्ट रूप से व्यक्त नहीं कर पाता।
हमें यह समझना चाहिए कि हर शब्द का अपना अलग और निश्चित अर्थ होता है, चाहे वह समानार्थी ही क्यों न हो। शब्दों के जाल में फँसकर भाव अपना वास्तविक अर्थ खो देते हैं।
संबंधित प्रश्न
कविता और बच्चे को समानांतर रखने के क्या कारण हो सकते हैं?
‘भाषा को सहूलियत’ से बरतने से क्या अभिप्राय है?
व्याख्या करें
ज़ोर ज़बरदस्ती से
बात की चूड़ी मर गई
और वह भाषा में बेकार घूमने लगी।
आधुनिक युग में कविता की संभावनाओं पर चर्चा कीजिए।
चूड़ी, कील, पेंच आदि मूर्त्त उपमानों के माध्यम से कवि ने कथ्य की अमूर्त्तता को साकार किया है। भाषा को समृद्ध एवं संप्रेषणीय बनाने में, बिबों और उपमानों के महत्त्व पर परिसंवाद आयोजित करें।
सुंदर है सुमन, विहग सुंदर
मानव तुम सबसे सुंदरतम।
प्रतापनारायण मिश्र का निबंध 'बात' और नागार्जुन की कविता 'बातें' ढूँढ़ कर पढ़ें।
निम्नलिखित प्रश्न को ध्यानपूर्वक पढ़कर प्रश्न के लगभग 60 शब्दों में उत्तर दीजिए :-
व्यक्ति पर प्रशंसा का क्या प्रभाव पड़ता है? 'बात सीधी थी पर' कविता के आधार पर बताइए।
