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यह बीसवीं शताब्दी के एक सुविख्यात अभिलेखशास्त्री, डी०सी० सरकार का वक्तव्य है-भारतीयों के जीवन, संस्कृति और गतिविधियों का ऐसा कोई पक्ष नहीं है - History (इतिहास)

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Question

यह बीसवीं शताब्दी के एक सुविख्यात अभिलेखशास्त्री, डी०सी० सरकार का वक्तव्य है-भारतीयों के जीवन, संस्कृति और गतिविधियों का ऐसा कोई पक्ष नहीं है जिनका प्रतिबिंब अभिलेखों में नहीं है : चर्चा कीजिए।

Long Answer
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Solution

पत्थर, धातु अथवा मिट्टी के बर्तन जैसी कठोर सतह पर खुदे हुए लेखों को अभिलेख के नाम से जाना जाता है। अभिलेख अथवा उत्कीर्ण लेख पुरातात्विक साधनों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण साधन हैं। अभिलेख प्रस्तर स्तूपों, शिलाओं, मंदिरों की दीवारों, ईंटों, मूर्तियों, ताम्रपत्रों और मुहरों आदि पर मिलते हैं। अभिलेखों में उनके निर्माताओं की उपलब्धियों, क्रियाकलापों अथवा विचारों का उल्लेख होता है। इनमें राजाओं के क्रियाकलापों एवं स्त्री-पुरुषों द्वारा धार्मिक संस्थाओं को दिए गए दान का विवरण होता है। अभिलेख एक प्रकार के स्थायी प्रमाण होते हैं। इनमें साहित्य के समान हेर-फेर नहीं किया जा सकता। अतः इस दृष्टि से अभिलेखों का महत्त्व और भी

अधिक बढ़ जाता है। अनेक अभिलेखों में उनके निर्माण की तिथियाँ भी उत्कीर्ण हैं। जिन पर तिथि नहीं मिलती, उनका काल निर्धारण सामान्यत: पुरालिपि अथवा लेखन शैली के आधार पर किया जाता है। अभिलेखों में मौर्य सम्राट अशोक के स्तम्भ लेख तथा शिलालेख सर्वाधिक प्राचीन एवं अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं। ये अभिलेख उसके विशाल साम्राज्य के सभी भागों से प्राप्त हुए हैं। सम्राट अशोक के अभिलेख चार लिपियों में मिलते हैं। अफगानिस्तान के शिलालेखों में अरामाइक और यूनानी लिपियों का प्रयोग किया गया है। पाकिस्तान क्षेत्र के अभिलेख खरोष्ठी लिपि में हैं। उत्तर में उत्तराखंड में कलसी से लेकर दक्षिण में मैसूर तक फैले अशोक के शेष साम्राज्य के अभिलेख ब्राह्मी लिपि में हैं।

अशोक के अभिलेख उसके शासनकाल के विभिन्न वर्षों में उत्कीर्ण किए गए थे। उन्हें राज्यादेश अथवा शासनादेश कहा जाता है, क्योंकि वे राजा की इच्छा अथवा आदेशों के रूप में प्रजा के लिए प्रस्तुत किए गए थे। नि:संदेह अभिलेख प्राचीन इतिहास के पुनर्निर्माण में हमारी महत्त्वपूर्ण सहायता करते हैं। चट्टानों अथवा स्तंभों पर उत्कीर्ण लेखों के प्राप्ति स्थानों से संबंधित शासक के राज्य की सीमाओं का भी अनुमान लगाया जा सकता है। उदाहरण के लिए अशोक के अभिलेखों के प्राप्ति स्थानों से उसके राज्यविस्तार पर प्रकाश पड़ता है। अशोक के बाद के अभिलेखों को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है-सरकारी अभिलेख और निजी अभिलेख। सरकारी अभिलेख या तो राजकवियों की लिखी हुई प्रशस्तियाँ हैं या भूमि अनुदान-पत्र। प्रशस्तियों में राजाओं और विजेताओं के गुणों राजा, किसान और नगर के और कीर्तियों का वर्णन किया गया है।

प्रशस्तियों का प्रसिद्ध उदाहरण-समुद्रगुप्त का प्रयोग अभिलेख है, जो अशोक स्तम्भ पर उत्कीर्ण है। इस प्रशस्ति में समुद्रगुप्त की विजयों और नीतियों का पूर्ण विवरण उपलब्ध होता है। गुप्तकाल के अधिकांश अभिलेखों में वंशावलियों का वर्णन है। इसी प्रकार राजा भोज की ग्वालियर प्रशस्ति में उसकी उपलब्धियों का वर्णन है। कलिंगराज खारवेल का हाथीगुम्फा अभिलेख, रुद्रदामा का गिरनार शिलालेख, स्कंदगुप्त का भीतरी स्तंभ लेख, बंगाल के शासक विजय सेन का देवपाड़ा अभिलेख और चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय का ऐहोल अभिलेख इस प्रकार के अभिलेखों के अन्य उदाहरण हैं। भूमि अनुदान-पत्र अधिकतर ताम्रपत्रों पर उकेरे गए हैं। इनमें ब्राह्मणों, भिक्षुओं, जागीरदारों, अधिकारियों, मंदिरों और विहारों आदि को दिए गए गाँवों, भूमियों और राजस्व के दानों का उल्लेख है।

ये प्राकृत, संस्कृत, तमिल, तेलुगु आदि विभिन्न भाषाओं में लिखे गए हैं। निजी अभिलेख अधिकांशतः मंदिरों में या मूर्तियों पर उत्कीर्ण हैं। इन पर खुदी तिथियों से इन मंदिरों के निर्माण एवं मूर्ति प्रतिष्ठापन के समय का पता लगता है। ये अभिलेख तत्कालीन धार्मिक दशा, मूर्तिकला, वास्तुकला एवं भाषाओं के विकास पर भी प्रकाश डालते हैं। उदाहरण के लिए, गुप्तकाल से पहले के अधिकांश अभिलेखों की भाषा प्राकृत है और उनमें बौद्ध धर्म एवं जैन धर्म का उल्लेख है। गुप्त एवं गुप्तोत्तर काल के अधिकांश अभिलेखों में ब्राह्मण धर्म का उल्लेख है और उनकी भाषा संस्कृत है। निजी अभिलेख तत्कालीन राजनैतिक दशा पर भी पर्याप्त प्रकाश डालते हैं। अतः बीसवीं शताब्दी के एक सुविख्यात अभिलेखशास्त्री डी०सी० सरकार के शब्दों में यह कहना उचित ही होगा कि-” भारतीयों के जीवन, संस्कृति और गतिविधियों का ऐसा कोई पक्ष नहीं है जिसका प्रतिबिम्ब अभिलेखों में नहीं है।”

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मूल बातें अभिलेखों का अर्थ कैसे निकाला जाता है?
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