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संविधान सभा ने भाषा के विवाद को हल करने के लिए क्या रास्ता निकला? - History (इतिहास)

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Question

संविधान सभा ने भाषा के विवाद को हल करने के लिए क्या रास्ता निकला?

Long Answer
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Solution

संविधान सभा के सामने एक अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न राष्ट्र की भाषा को लेकर था। भारत में प्रारंभ से ही अनेक भाषाएँ प्रचलन में रही हैं। देश के भिन्न-भिन्न भागों एवं प्रांतों में भिन्न-भिन्न भाषाओं का प्रयोग किया जाता है। अतः जब संविधान सभा के सामने राष्ट्र की भाषा का मुद्दा आया, तो इस पर कई महीनों तक बहस होती रही और कई बार तनाव की स्थिति भी उत्पन्न हुई। 1930 के दशक तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने यह स्वीकार कर लिया था कि हिंदुस्तानी को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा प्रदान किया जाना चाहिए। हिन्दुस्तानी की उत्पत्ति हिंदी और उर्दू के मेल से हुई थी। यह भारतीय जनता के एक विशाल भाग की भाषा थी। विभिन्न संस्कृतियों के आदान-प्रदान से समृद्ध हुई यह एक साझी भाषा बन गई थी। समय के साथ-साथ इसमें अनेक स्रोतों से नए-नए शब्दों और अर्थों का समावेश होता गया, जिसके परिणामस्वरूप विभिन्न क्षेत्रों के अनेक लोग इसे समझने में समर्थ हो गए। गाँधी जी भी हिंदुस्तानी को राष्ट्र भाषा बनाए जाने के पक्ष में थे। उनका विचार था कि हरेक को एक ऐसी भाषा का प्रयोग करना चाहिए, जिसे सभी लोग सरलतापूर्वक समझ सकें।

राष्ट्रभाषा की विशेषताओं पर अपने विचार व्यक्त करते हुए गाँधी जी ने कहा था, “यह हिंदुस्तानी न तो संस्कृतनिष्ठ हिंदी होनी चाहिए और न ही फ़ारसीनिष्ठ उर्दू। इसे दोनों का सुन्दर मिश्रण होना चाहिए। उसे विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं से खुलकर शब्द उधार लेने चाहिए।” गाँधी जी का विचार था कि हिंदुस्तानी ही हिंदुओं और मुसलमानों को तथा उत्तर और दक्षिण के लोगों को समान रूप से एकजुट करने में समर्थ हो सकती थी। किंतु हमें याद रखना चाहिए कि 19वीं शताब्दी के अंत से एक भाषा के रूप में हिंदुस्तानी के स्वरूप में धीरे-धीरे परिवर्तन होने लगा था। सांप्रदायिक भावनाओं के प्रसार के साथ-साथ हिंदी और उर्दू एक-दूसरे से दूर होने लगी थीं और इस प्रकार भाषा भी धार्मिक पहचान की रणनीति का एक भाग बन गई थी। संविधान सभा के अनेक सदस्य हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलवाना चाहते थे। संयुक्त प्रांत के एक कांग्रेसी सदस्य आर०वी० धुलेकर ने संविधान सभा के एक प्रारंभिक सत्र में ही हिन्दी को संविधान निर्माण की भाषा के रूप में प्रयोग किए जाने की माँग. की थी। धुलेकर की इस माँग का कुछ अन्य सदस्यों द्वारा विरोध किया गया। उनका तर्क था कि क्योंकि सभा के सभी सदस्य हिन्दी नहीं समझते, इसलिए हिंदी संविधान निर्माण की भाषा नहीं हो सकती थी।

इस प्रकार भाषा का मुद्दा तनाव का कारण बन गया और यह आगामी तीन वर्षों तक सदस्यों को उत्तेजित करता रहा। 12 सितम्बर, 1947 ई० को राष्ट्रभाषा के मुद्दे पर धुलेकर के भाषण से एक बार फिर तूफान उत्पन्न हो गया। इस बीच संविधान सभा की भाषा समिति द्वारा अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की जा चुकी थी। समिति ने राष्ट्रभाषा के मुद्दे पर हिन्दी । समर्थकों तथा हिंदी विरोधियों के मध्य उत्पन्न हुए गतिरोध को समाप्त करने के लिए एक फार्मूला ढूंढ निकाला था। समिति का सुझाव था कि देवनागरी लिपि में लिखी हिन्दी को भारत की राजकीय भाषा का दर्जा दिया जाए, किन्तु समिति द्वारा इस फार्मूले की घोषणा नहीं की गई, क्योंकि उसका विचार था कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए क्रमशः आगे बढ़ना चाहिए। फार्मूले के अनुसार (1) यह निश्चित किया गया कि पहले 15 वर्षों तक सरकारी कार्यों में अंग्रेजी भाषा का प्रयोग जारी रखा जाएगा। (2) प्रत्येक प्रांत को अपने सरकारी कार्यों के लिए किसी एक क्षेत्रीय भाषा के चुनाव का अधिकार होगा। इस प्रकार, संविधान सभा की भाषा समिति ने विभिन्न पक्षों की भावनाओं को संतुष्ट करने तथा एक । सर्वस्वीकृत समाधान प्रस्तुत करने के उद्देश्य से हिंदी को राष्ट्रभाषा के स्थान पर राजभाषा घोषित किया।

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संविधान की दृष्टि
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