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निम्नलिखित गद्यांश को पढ़िए और उसके नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर हिन्दी में लिखिए: आज चित्रा को जाना था। अरुणा सवेरे से ही उसका सारा सामान ठीक कर रही थी। एक-एक करके चित्रा सबसे मिल आई। - Hindi

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Question

निम्नलिखित गद्यांश को पढ़िए और उसके नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर हिन्दी में लिखिए:

आज चित्रा को जाना था। अरुणा सवेरे से ही उसका सारा सामान ठीक कर रही थी। एक-एक करके चित्रा सबसे मिल आई। बस, गुरूजी से मिलना रह गया था सो उनका आशीर्वाद लेने चल पड़ी। तीन बज गए थे पर, वह लौटी नहीं। पाँच बजे की गाड़ी से वह जाने वाली थी। अरुणा ने सोचा वह खुद जाकर देख आए कि आखिर बात क्या हो गई। तभी बड़बड़ाती-सी चित्रा ने प्रवेश किया, “बड़ी देर हो गई ना।”

दो कलाकार - मन्नू भण्डारी

Do Kalakar - Mannu Bhandari

  1. चित्रा को कहाँ जाना था और क्यों?  [2]
  2. चित्रा तथा अरुणा का परिचय दीजिए।  [2]
  3. चित्रा को आने में देर क्यों हो गई थी? विस्तार से लिखिए।  [3]
  4. पाठ के शीर्षक के अनुसार चित्रा और अरुणा दोनों कलाकार हैं। कहानी के माध्यम से स्पष्टकीजिए कि आपकी दृष्टि में कौन सच्चा कलाकार है।  [3]
Comprehension
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Solution

  1. चित्रकला से संबंधित प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए चित्रा को विदेश जाना था।
  2. चित्रा और अरुणा मन्नू भंडारी की कहानी ‘दो कलाकार’ की मुख्य पात्र हैं। चित्रा एक कोमल स्वभाव की भावनात्मक लड़की है, जिसमें एक कलाकार बनने की पूरी क्षमता है। अरुणा उसकी घनिष्ठ मित्र है, जो चित्रा की यात्रा की तैयारियों में उसकी सहायता करती है। इससे यह स्पष्ट होता है कि अरुणा एक जिम्मेदार और सहायक स्वभाव की लड़की है।
  3. चित्रा के देर से पहुँचने का कारण यह था कि वह गुरूजी से आशीर्वाद लेने गई थी और वहाँ अधिक समय व्यतीत हो गया। चित्रा अत्यंत संवेदनशील और भावुक स्वभाव की है तथा उसे अपने गुरु के प्रति गहरा सम्मान और लगाव है। जब यात्रा का समय निकट आया, तब उसे लगा कि केवल गुरुजी से मिलना शेष रह गया है। वह उनके पास आशीर्वाद लेने गई, किंतु वहाँ से लौटने में विलंब हो गया।
  4. मन्नू भंडारी की कहानी ‘दो कलाकार’ में चित्रा और अरुणा दोनों को कलाकार के रूप में प्रस्तुत किया गया है, परंतु उनकी कला और व्यक्तित्व में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। मेरे विचार में चित्रा सच्ची कलाकार है, क्योंकि वह भावनात्मक और संवेदनशील कलाकार है, जिसकी कला उसके भीतर से उत्पन्न होती है। वह केवल बाहरी रूप से कला का अभ्यास नहीं करती, बल्कि उसे आत्मसात करती है। गुरुजी से मिलने के प्रति उसका आकर्षण यह दर्शाता है कि वह कला को केवल तकनीक नहीं, बल्कि एक गहरे आध्यात्मिक अनुभव के रूप में समझती है।
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