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'ज्ञान की पूँजी बनाना चाहिए', इस विषय पर अपने विचार लिखिए। - Hindi

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Question

‘ज्ञान की पूँजी बनाना चाहिए’, इस विषय पर अपने विचार लिखिए।

Very Long Answer
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Solution

ज्ञान मनुष्य की सबसे बड़ी संपत्ति है। धन-दौलत, पद-प्रतिष्ठा और भौतिक वस्तुएँ समय के साथ नष्ट हो सकती हैं, परंतु ज्ञान कभी नष्ट नहीं होता। ज्ञान व्यक्ति के व्यक्तित्व को निखारता है, सोच को विस्तृत करता है और जीवन में सही निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करता है।

जिस प्रकार कोई व्यक्ति धन जमा करके भविष्य सुरक्षित करता है, उसी प्रकार ज्ञान की पूँजी बनाना हमारे जीवन को सुरक्षित, समृद्ध और सफल बनाता है। ज्ञान से आत्मविश्वास बढ़ता है, विचारों में प्रगल्भता आती है और व्यक्ति समाज में सम्मान प्राप्त करता है।

ज्ञान हमें कठिन परिस्थिति में मार्ग दिखाता है और समस्याओं का समाधान करने की शक्ति देता है। यह हमें विवेकवान, संवेदनशील और जिम्मेदार बनाता है। ज्ञान की पूँजी जितनी बढ़ती है, उतना ही व्यक्ति का जीवन उज्ज्वल होता जाता है।

इसलिए हमें निरंतर पढ़ते रहना चाहिए, सीखते रहना चाहिए और अपने अनुभवों से भी ज्ञान अर्जित करते रहना चाहिए। यही ज्ञान हमारे जीवन की अमूल्य पूँजी है, जो हर कदम पर हमारा साथ देती है।

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वृंद के दोहे
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Chapter 5.2: वृंद के दोहे - स्वाध्याय [Page 29]

APPEARS IN

Balbharati Hindi Yuvakbharati [English] Standard 12 Maharashtra State Board
Chapter 5.2 वृंद के दोहे
स्वाध्याय | Q ३. (आ) | Page 29

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कारण लिखिए:

सरस्वती के भंडार को अपूर्व कहा गया है:-


कारण लिखिए :
व्यापार में दूसरी बार छल-कपट करना असंभव होता है :-


सहसंबंध जोड़िए:-


‘चादर देखकर पैर फैलाना बुद्‌धिमानी कहलाती है’, इस विषय पर अपने विचार व्यक्त कीजिए ।


जीवन के अनुभवों और वास्तविकता से परिचित कराने वाले वृंद जी के दोहों का रसास्वादन कीजिए।


निम्नलिखित प्रश्‍न का केवल एक वाक्य में उत्तर लिखिए:

वृंद जी की प्रमुख रचनाएँ लिखिए।


दोहा छंद की विशेषताएँ बताइए।


निम्नलिखित पठित काव्यांश पढ़कर दी गई सूचनाओं के अनुसार कृतियाँ कीजिए:

सरसुति के भंडार की, बड़ी अपूरब बात।
ज्यौं खरचै त्यौं-त्यौं बढ़ै, बिन खरचे घटि जात।।

नैना देत बताय सब, हिय को हेत-अहेत।
जैसे निरमल आरसी, भली बुरी कहि देत।।

अपनी पहुँच बिचारि कै, करतब करिए दौर।
तेते पाँव पसारिए, जेती लाँबी सौर।।

फेर न ह्‌वै हैं कपट सों, जो कीजै ब्यौपार।
जैसे हाँड़ी काठ की, चढ़ै न दूजी बार।।

ऊँचे बैठे ना लहैं, गुन बिन बड़पन कोइ।
बैठो देवल सिखर पर, वायस गरुड़ न होइ।।

उद्यम कबहुँ न छाँड़िए, पर आसा के मोद।
गागरि कैसे फोरिए, उनयो देखि पयोद।।

1. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए:  (2)

  1. उपर्युक्त पद्यांश में आँखों कीं तुलना किससे की गई ?
  2. काम शुरू करने से पहले किस बारे में सोचना बहुत जरूरी होता है ?
  3. सरस्वती का भंडार अपूर्व क्यों है?
  4. दूसरे की आशा के भरोसे कया बंद नहीं करना चाहिए?

2. निम्नलिखित शब्दों के लिंग पहचानकर लिखिए:   (2)

  1. सौर - ______
  2. नैना - ______
  3. पाँव - ______
  4. काठ - ______

3. चादर देखकर पैर फैलाना बुद्धिमानी कहलाती हैं। इस विचार पर अपना मत 40 से 50 शब्दों में व्यक्त कीजिए:   (2)


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