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Question
‘हमारे समाज में एक बेटी को अपने मायके में हर संभव प्रयास करने के बावजूद बेटे के समान दर्जा नहीं मिलता और उसे ‘पराया धन’ माना जाता हैं, चाहे माता-प्रिता की नजरें में हो या भाई और भाभी की।’
‘आउट साइडर’ कहानी के संदर्भ में इस कथन की समीक्षा कीजिए।
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Solution
‘आउटसाइडर’ कहानी भारतीय समाज में बेटी की स्थिति और उसके स्थान को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने वाली एक महत्वपूर्ण रचना है। यह कहानी इस सच्चाई को सामने लाती है कि भले ही बेटी को मायके में प्रेम और अधिकार मिलते हों, फिर भी समाज में उसे आज भी ‘पराया धन’ समझा जाता है। इसी कारण वह अपने ही जन्मस्थान में स्वयं को एक बाहरी व्यक्ति के रूप में अनुभव करती है और उसे कभी पूर्ण अधिकार प्राप्त नहीं हो पाते।
बेटी की स्थिति और ‘आउटसाइडर’ कहानी की प्रासंगिकता
- मायके में बेटी की सीमित भूमिका: कहानी की नायिका जब अपने मायके वापस आती है, तो उसे महसूस होता है कि उसकी स्थिति अब पहले जैसी नहीं रही। उसे प्रेम तो प्राप्त होता है, परंतु वह स्वयं को एक अस्थायी अतिथि के रूप में अनुभव करती है। विवाह के बाद घर में भाई-भाभी का अधिकार बढ़ जाता है और उसके विचार या निर्णय महत्वहीन हो जाते हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि विवाह के पश्चात बेटी का मायके पर पूर्ण अधिकार नहीं रहता, जबकि बेटे को ही परिवार का उत्तराधिकारी माना जाता है।
- बेटी का ‘पराया धन’ समझा जाना: हमारे समाज में बेटी को बचपन से ही यह समझाया जाता है कि उसका वास्तविक घर ससुराल है और मायका केवल उसका जन्मस्थान होता है, न कि उसका अधिकार क्षेत्र। विवाह के बाद जब वह मायके आती है, तो उसे एक अस्थायी मेहमान के रूप में देखा जाता है। परिवार के महत्वपूर्ण निर्णयों में उसकी राय को विशेष महत्व नहीं दिया जाता। ‘आउटसाइडर’ कहानी की नायिका भी इसी अनुभव से गुजरती है।
- भाई और भाभी का व्यवहार: कई स्थितियों में भाई-भाभी बेटी को उसके मायके में पूरी तरह अपनाने को तैयार नहीं होते। कहानी में भी यह स्पष्ट होता है कि मायके से जुड़े निर्णय लेने का पूरा अधिकार भाई और भाभी के पास होता है, जबकि बेटी को परोक्ष रूप से बाहरी व्यक्ति माना जाता है। यद्यपि बेटी का अपने मायके से भावनात्मक जुड़ाव बना रहता है, फिर भी संपत्ति और अधिकार से जुड़े मामलों में उसे प्रायः हाशिए पर ही रखा जाता है।
- माता-पिता की असहायता: माता-पिता की असहायता यह दर्शाती है कि वे अपनी बेटी से प्रेम तो करते हैं, पर समाज में प्रचलित धारणाओं के कारण उसे बेटे के समान अधिकार नहीं दे पाते। वे सामाजिक व्यवस्था से बँधे होते हैं, जहाँ बेटे को घर का उत्तराधिकारी और बेटी को पराया माना जाता है। माता-पिता बेटी को भावनात्मक सहयोग तो प्रदान करते हैं, लेकिन जब संपत्ति, उत्तराधिकार या घर की जिम्मेदारी की बात आती है, तब प्राथमिकता बेटे को ही दी जाती है।
समाज में बेटा-बेटी के भेदभाव की समीक्षा
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सांस्कृतिक मानसिकता: सदियों से समाज में बेटी को पराया धन मानने की सोच बनी हुई है, जिसके कारण उसे अपने मायके में कभी भी पूर्ण अधिकार प्राप्त नहीं हो पाते।
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कानूनी अधिकार और सामाजिक सच्चाई: यद्यपि कानून बेटियों को संपत्ति में अधिकार प्रदान करता है, फिर भी व्यवहारिक रूप से उन्हें आज भी यह अधिकार पाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है।
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भावनात्मक लगाव और सामाजिक सीमाएँ: बेटी का अपने मायके से गहरा भावनात्मक संबंध होता है, किंतु समाज उसे वहाँ एक स्थायी सदस्य के रूप में स्वीकार नहीं करता।
