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Question
ग्रामीण क्षेत्रों की सामाजिक व्यवस्था की कुछ विशेषताएँ क्या हैं?
Long Answer
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Solution
- गाँवों का आकार छोटा होता है। अतः ये अधिकांशतः व्यक्तिगत संबंधों का अनुमोदन करते हैं। गाँव के लोगों द्वारा तकरीबन गाँव के ही दूसरे लोगों को देखकर पहचान लेना असामान्य नहीं है।
- गाँव की सामाजिक संरचना परंपरागत तरीकों से चालित होती है। इसलिए सामाजिक संस्थाएँ जैसे-जाति, धर्म तथा सांस्कृतिक एवं परंपरागत सामाजिक प्रथाओं के दूसरे स्वरूप यहाँ अधिक प्रभावशाली हैं।
- इन कारणों से जब तक कोई विशिष्ट परिस्थितियाँ न हों, गाँवों में परिवर्तन नगरों की अपेक्षा धीमी गति से होता है।
- समाज के अधीनस्थ समूहों के पास ग्रामीण इलाके में अपने नगरीय भाइयों की तुलना में अभिव्यक्ति के दायरे बहुत कम होते हैं। गाँव में व्यक्ति एक दूसरे से सीधा संबद्ध होता है। इसलिए व्यक्ति विशेष का समुदाय के साथ असहमत होना कठिन होता है और इसका उल्लंघन करने वाले को सबक सिखाया जा सकता है।
- प्रभावशाली वर्गों की शक्ति सापेक्षिक रूप से कहीं ज्यादा होती है, क्योंकि वे रोज़गार के साधनों तथा अधिकांशतः अन्य संसाधनों को नियंत्रित करते हैं। अतः गरीबों को प्रभावशाली वर्गों पर निर्भर होना पड़ता है, क्योंकि उनके पास रोजगार के अन्य साधन अथवा सहारा नहीं होता।
- यदि गाँव में पहले से ही मजबूत शक्ति संरचना होती तो उसे उखाड़ फेंकना बहुत कठिन होता है। ग्रामीण क्षेत्रों में शक्ति संरचना के संदर्भ में होने वाला परिवर्तन और भी धीमा होता है, क्योंकि वहाँ की सामाजिक व्यवस्था अधिक मजबूत और स्थिर होती है।
- अन्य परिवर्तन आने में भी समय लगता है, क्योंकि गाँव बिखरे होते हैं तथा पूरी दुनिया से एकीकृत नहीं होते जैसे-नगर तथा कस्बे होते हैं।
- अन्य संचार के साधनों में भी समय के साथ सुधार आया है। इसके कारण मात्र कुछ एक गाँव ‘एकांत’ तथा ‘पिछड़ा’ होने का दावा कर सकते हैं।
- जनसंख्या का उच्च घनत्व स्थान पर अत्यधिक जोर देता है तथा तार्किक स्तर पर जटिल समस्याएँ खड़ी करता है। कस्बों सामाजिक व्यवस्था की बुनियादी कड़ी है, जो कि नगर की देशिक जीवनक्षमता को
आश्वस्त करें। - इसका अर्थ है कि संगठन तथा प्रबंधन कुछ चीजों को जैसे निवास तथा आवासीय पद्धति; जन यातायात के साधन उपलब्ध कर सकें, ताकि कर्मचारियों की बड़ी संख्या को कार्यस्थल से लाया तथा ले जाया जा सके; आवासीय सरकारी तथा औद्योगिक भूमि उपयोग क्षेत्र के सह-अस्तित्व की व्यवस्था।
- सभी प्रकार के जनस्वास्थ्य, स्वच्छता, पुलिस सेवा, जनसुरक्षा तथा कस्बे के शासन पर नियंत्रण की आवश्यकता है।
- इनमें से प्रत्येक कार्य अपने आप में एक वृहत उपक्रम है तथा योजना, क्रियान्विति और रखरखाव को दुर्जय चुनौती देता है।
- वे कार्य जो समूह, नृजातीयता, धर्म, जाति इत्यादि के विभाजन तथा तनाव से न केवल जुड़े, बल्केि सक्रिय भी होते हैं।
- गरीब के लिए आवास की समस्या ‘बेघर’ तथा सड़क पर चलने वाले लोग इस प्रक्रिया को जन्म देते हैं जो सड़कों, फुटपाथों, पुलों तथा फ्लाईओवर के नीचे, खाली बिल्डिग तथा अन्य खाली स्थानों पर रहने तथा जीवनयापन करते हैं। यह इन बस्तियों के जन्म का एक महत्वपूर्ण कारण भी है।
- संपति का अधिकार दूसरे स्थानों की तरह नहीं होता है। अतः बस्तियाँ दादाओं की जन्मभूमि होती हैं, जो उन लोगों पर अपना बलात् अधिकार दिखाते हैं, जो वहाँ रहते हैं।
- पूरे विश्व में नगरीय आवासीय क्षेत्र प्रायः समूह तथा अधिकतर प्रजाति नृजातीयता, धर्म तथा अन्य कारकों द्वारा विभाजित होते हैं। इन पहचानों के बीच तनाव के प्रमुख परिणाम पृथकीकरण की प्रक्रिया के रूप में भी उजागर होता है। उदाहरण के लिए, भारत में विभिन्न धर्मों के बीच सांप्रदायिक तनाव, विशेषकर हिंदुओं तथा मुसलमानों में देखा जा सकता है, जिसके परिणामस्वरूप मिश्रित प्रतिदेशी एकल-समुदाय में बदल गए।
- सांप्रदायिक दंगों को ये एक विशिष्ट देशिक रूप दे देते हैं, जो बस्तीकरण की नवीन प्रक्रिया घैटोआइजेशन को ओर बढ़ाते हैं।
- पूरे विश्व में व्याप्त ‘गेटेड समुदाय’ जैसी वृद्धि भारतीय शहरों में भी देखी जा सकती है। इसका अर्थ है एक समृद्ध प्रतिवेशी (पडौसी) का निर्माण जो अपने परिवेश से दीवारों तथा प्रवेशद्वारों से अलग होता है वे यहाँ प्रवेश तथा निवास नियंत्रित होता है। अधिकांश ऐसे समुदायों की अपनी सामानांतर नागरिक सुविधाएँ; जैसे-पानी और
बिजली सप्लाई, पुलिस तथा सुरक्षा भी होती है।
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गाँव, कस्बों और नगरों में सामाजिक व्यवस्था तथा सामाजिक परिवर्तन
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