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अंतःकर्ण में ध्वनि द्वारा तंत्रिका आवेग उत्पन्न होने की क्रियाविधि का वर्णन कीजिए।

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Question

अंतःकर्ण में ध्वनि द्वारा तंत्रिका आवेग उत्पन्न होने की क्रियाविधि का वर्णन कीजिए।

Answer in Brief
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Solution

अंतःकर्ण में ध्वनि द्वारा तंत्रिका आवेग उत्पन्न होने की क्रियाविधि- कर्ण के निम्नलिखित प्रमुख दो कार्य होते हैं -

(i) कर्ण का प्राथमिक कार्य शरीर का स्थैतिक तथा गतिक संतुलन बनाए रखने तथा

(ii) ध्वनि ग्रहण करना अर्थात श्रवण क्रिया।

अंतःकर्ण के कला गहन के कॉक्लिया में स्थित कॉरटाई का अंग ध्वनि के उद्दीपनों को ग्रहण करने के लिए उत्तरदायी है। श्रवण क्रिया में कर्ण द्वारा एक विशेष आवृत्ति की ध्वनि कंपनों को ग्रहण करके कॉरटाई के अंग में स्थित संवेदी कोशिकाओं तक भेजा जाता है। संवेदी कोशिकाएँ इन तरंगों को तंत्रिका के क्रिया विभव में परिवर्तित कर देते हैं। मस्तिष्क के ध्वनि वल्कुट सुनने का कार्य करता है। मनुष्य का कर्ण 16 से 20,000 साइकिल प्रति सेकंड की ध्वनि तरंगों को ग्रहण कर सकता है।

बाह्य कर्ण पल्लव ध्वनि तरंगों को कर्ण कुहर में भेज देता है। ध्वनि तरंगें कर्णपटह में कंपन उत्पन्न करती हैं।

मध्य कर्ण की कर्ण अस्थिकाओं द्वारा कर्णपटह से कम्पन अण्डाकार गवाक्ष के ऊपर चढ़ी झिल्ली पर पहुँचते हैं। इसके फलस्वरूप अंतःकर्ण के स्कैला वेस्टीबुली के परी लसीका में कंपन होने लगता है। यहाँ से कम्पन स्कैला टिम्पैनी के परी लसीका में पहुंचते हैं।

रीसनर्स कला तथा बेसीलर कला में कम्पन होने से स्कैला मीडिया के अन्त:लसीका में कंपन होने लगता है जिससे कॉरटाई के अंग के संवेदी रोमों में कंपन होने लगता है। संवेदी रोमों के कम्पन ट्यूटोरियल कला में कंपन उत्पन्न करके ध्वनि संवेदना की प्रेरणा उत्पन्न कर देते हैं। श्रवण तंत्रिका द्वारा ध्वनि संवेदना मस्तिष्क के ध्वनि वल्कुट तक पहुँच जाती है। ध्वनि की तीव्रता संवेदी रोमों के कम्पन की तीव्रता से ज्ञात होती है। ध्वनि तरंगों के कम्पन वृत्ताकार गवाक्ष की झिल्ली से टकराकर समाप्त हो जाते हैं।

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संवेदीक अभिग्रहण एवं संसाधन - कर्ण
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