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‘आषाढ़ का एक दिन’ नाटक के माध्यम से नाटककार ने आधुनिक युग की समस्याओं को उजागर करने का सफल प्रयास किया है। इस कथन की विवेचना कीजिए। - Hindi (Indian Languages)

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Question

‘आषाढ़ का एक दिन’ नाटक के माध्यम से नाटककार ने आधुनिक युग की समस्याओं को उजागर करने का सफल प्रयास किया है। इस कथन की विवेचना कीजिए।

Very Long Answer
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Solution

‘आषाढ़ का एक दिन’ हिंदी के प्रयोगधर्मी नाटककार मोहन राकेश की रचना है। यह एक यथार्थवादी नाटक है, जिसमें ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के माध्यम से आधुनिक जीवन के भाव-बोध को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया गया है। नाटक में कालिदास के साथ समकालीन अनुभवों के अनेक संकेत मिलते हैं, जो इसे कई स्तरों पर रोचक और अर्थपूर्ण बनाते हैं। इसमें संघर्ष, कला और प्रेम, सृजनशील व्यक्ति और परिवेश, भावना और कर्म, कलाकार और राज्याश्रय जैसे विविध पक्षों को छुआ गया है। समय के प्रवाह और उसके प्रभाव को भी तीव्रता तथा आकर्षक नाटकीयता के साथ प्रस्तुत किया गया है।

यद्यपि परिस्थितियाँ प्राचीन हैं, पर उनके संदर्भ पूरी तरह आधुनिक हैं। कालिदास भले ही मल्लिका से प्रेम करता हो, पर उसकी मूल पहचान एक कवि की है। उसके लिए सर्वोच्च और अंतिम मूल्य साहित्य-सृजन ही है। पूरे नाटक में यही आंतरिक द्वंद्व उभरकर सामने आता है। इसी कारण उज्जयिनी पहुँचकर वह मल्लिका और अपने ग्राम-प्रदेश से दूर होता चला जाता है। उज्जयिनी में कालिदास की जीवन-शैली बदल जाती है और उसका जीवन मानो उसका अपना नहीं रह जाता। प्रियंगुमंजरी से विवाह की मजबूरी, ऐश्वर्य और विलास से भरा जीवन, तथा सृजनशक्ति पर मंडराते संकट, ये सब इसी परिवर्तन की ओर संकेत करते हैं।

जब उसे अपनी स्थिति का बोध होता है, तो वह स्वयं स्वीकार करता है, “अधिकार मिला, बहुत सम्मान मिला, जो कुछ मैंने लिखा उसकी प्रतियाँ देश भर में पहुँचीं, फिर भी मैं सुखी नहीं हुआ। किसी और के लिए वही वातावरण और जीवन स्वाभाविक हो सकता था, मेरे लिए नहीं।” वह यह भी समझता है कि राज्याधिकारी का कार्यक्षेत्र उसके रचनात्मक कार्यक्षेत्र से भिन्न है। इस तरह यह ऐतिहासिक कालिदास नहीं, बल्कि आधुनिक कालिदास का चित्र बन जाता है। आज बड़े नगरों में ऊँचे पदों पर बैठे साहित्यकारों की स्थिति भी कुछ ऐसी ही दिखाई देती है। वे आत्मा के प्रति निष्ठावान रहकर उच्च मूल्यों के साथ सृजन करना चाहते हैं, लेकिन राज्याश्रय का दबाव उन्हें स्वतंत्र रूप से ऐसा करने नहीं देता। राजाज्ञा के आगे वे कई बार कठपुतली जैसे प्रतीत होते हैं।

अतः स्पष्ट है कि नाटककार ने भले ही कथानक का आधार इतिहास से लिया हो, पर उसकी रूप-रेखा, सज्जा और आत्मा को अपनी कल्पना व आधुनिक दृष्टि से गढ़ा है। इसमें आधुनिक स्त्री-पुरुष संबंधों की समस्या भी उतनी ही सशक्त है जितनी राज्याश्रय की। अंततः कालिदास अपने अस्तित्व और आत्म-संरक्षण की लड़ाई में असमर्थ-सा नजर आता है।

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