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व्याख्या कीजिये तिरती है समीर-सागर परअस्थिर सुख पर दुख की छाया-जग के दग्ध हृदय परनिर्दय विप्लव की प्लावित माया-

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प्रश्न

व्याख्या कीजिये

तिरती है समीर-सागर पर
अस्थिर सुख पर दुख की छाया-
जग के दग्ध हृदय पर
निर्दय विप्लव की प्लावित माया-

स्पष्ट करा
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उत्तर

संदर्भ - प्रस्तुत काव्यांश पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग-2’ में संकलित ‘बादल राग’ शीर्षक कविता से लिया गया है। इसके कवि महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जी हैं।

प्रसंग - इस काव्यांश में कवि ने बादल को क्रांति और परिवर्तन का प्रतीक मानते हुए उसका आवाहन किया है।

व्याख्या - कवि बादल को संबोधित करके कहता है कि हे क्रांति के संदेशवाहक बादल! जिस प्रकार वायु सागर के ऊपर निरंतर विचरण करती रहती है और जैसे मानव जीवन के क्षणभंगुर सुखों पर दुखों की परछाई मंडराती रहती है, उसी प्रकार संसार के संतप्त हृदय पर तेरी कठोर क्रांति की माया छाई हुई है। अर्थात् मनुष्य के जीवन में सुखों के साथ-साथ दुख रूपी बादल भी सदैव उपस्थित रहते हैं। वे कभी एक स्थान पर टिके नहीं रहते। संसार के कष्टों से व्यथित और जले हुए हृदय पर क्रांति का व्यापक और प्रभावशाली विस्तार छाया हुआ है। जिस प्रकार क्रांति शोषण, अन्याय और दुखों का अंत करके सुख, शांति और समृद्धि का वातावरण निर्मित करती है, उसी प्रकार क्रांति का प्रतीक बादल भी ग्रीष्म ऋतु की तीव्र गर्मी से पीड़ित संसार को नवीन आनंद, सुख और आशा का संदेश देने आता है।

विशेष -

  • बादल को क्रांति के दूत के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
  • भाषा तत्सम प्रधान खड़ी बोली है।
  • ‘समीर-सागर’ तथा ‘दुख की छाया’ में रूपक अलंकार का प्रयोग हुआ है।
  • वीर रस की प्रधानता है।
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बादल राग
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पाठ 6: सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' (बादल राग) - अभ्यास [पृष्ठ ३६]

APPEARS IN

एनसीईआरटी Hindi Aaroh Bhag 2 [English] Class 12
पाठ 6 सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' (बादल राग)
अभ्यास | Q 1. | पृष्ठ ३६

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‘बादल राग’ कविता के आधार पर भाव स्पष्ट कीजिए - "विप्लव-रव से छोटे ही हैं शोभा पाते।"


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