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वान्टहॉफ कारक की सहायता से समझाइए कि अणुसंख्यक गुण मापन विधि द्वारा कुछ विलेयों के लिए निर्धारित द्रव्यमान असामान्य क्यों होता है।

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प्रश्न

वान्टहॉफ कारक की सहायता से समझाइए कि अणुसंख्यक गुण मापन विधि द्वारा कुछ विलेयों के लिए निर्धारित द्रव्यमान असामान्य क्यों होता है।

दीर्घउत्तर
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उत्तर

कुछ यौगिक उपयुक्त विलायक में घोलने पर वियोजित अथवा संगुणित हो जाते हैं।

उदाहरणार्थ, हाइड्रोजन बंध बनने के कारण एथेनॉइक अम्ल का बेन्जीन में द्विलकीकरण होता है। जबकि जल में घोले जाने पर यह वियोजित होकर आयन बनाता है। इसके परिणामस्वरूप विलयन में रासायनिक स्पीशीज़ की संख्या विलयन बनाने के लिए मिलाई गई विलेय की रासायनिक स्पीशीज़ की संख्या की तुलना में कम अथवा अधिक हो जाती है। चूंकि अणुसंख्यक गुणों का 'परिमाण विलेय कणों की संख्या पर निर्भर करता है, इसलिए यह आशा की जाती है कि अणुसंख्यक गुणों के आधार पर ज्ञात किया गया द्रव्यमान अनुमानित मान अथवा सामान्य मान से कम अथवा अधिक प्राप्त होगा तथा इसे असामान्य आण्विक द्रव्यमान कहते हैं।

विलयन में अणुओं के संगुणन अथवा वियोजन के निर्धारण के लिए वान्टहॉफ ने एक कारक प्रस्तावित किया जिसे वान्टहॉफ कारक, i, कहते हैं। इसे निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित किया जा सकता है-

i = `"अनुमानित मोलर द्रव्यमान"/"असामान्य मोलर द्रव्यमान"`

i = `"प्रेक्षित अणुसंख्य गुणधर्म"/"परिकलित अणुसंख्य गुणधर्म"`

= `"संगुणन/वियोजन के उपरांत कणों के मोलों की कुल संख्या"/"संगुणन/वियोजन से पूर्व कणों के मोलों की कुल संख्या"`

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अनुसंख्य गुणधर्म और आण्विक द्रव्यमान की गणना
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पाठ 2: विलयन - अभ्यास [पृष्ठ २९९]

APPEARS IN

एनसीईआरटी एक्झांप्लर Rasayan Vigyaan [Hindi] Class 12
पाठ 2 विलयन
अभ्यास | Q VI. 62. | पृष्ठ २९९

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