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प्रश्न
उदाहरणानुसारं सार्थक पदं लिखत –
| क | दा | चि | त |
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उत्तर
कदाचित।
संबंधित प्रश्न
उचितपदानि चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत –
______ पतति।
उचितविभक्तिं प्रयुज्य रिक्तस्थानानि पूरयत –
महिला ______ गच्छन्ति। (उद्यान)
उचितविभक्तिं प्रयुज्य रिक्तस्थानानि पूरयत –
तत्र ताः ______ कुर्वन्ति। (व्यायाम)
उदाहरणानुसारं लिखित –
| शब्द: | विभक्तिः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुचनम् |
| पत्र | द्वितीया | पत्रम् | पत्रे | पत्राणि |
| फल | ______ | ______ | ______ | ______ |
उचितपदेन रिक्तस्थानानि पूरयत –
रङ्गशालायः शोभा ______ भवति।
कोष्ठकात् उचितं पदं चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत –
______ होनः पशुभिः समानः।
अधोलिखितशब्दान् उदाहरणानुसारं लिखत –
| श्रमिकः | ||
| श्रमिकाय | श्रमिका | श्रमिकाभ्याम् |
| जन: | ||
| ______ | ______ | ______ |
अधोलिखितशब्दान् उदाहरणानुसारं लिखत –
| लता | ||
| लतायै | लताभ्याम् | लताभ्यः |
| रमा | ||
| ______ | ______ | ______ |
अधोलिखितशब्दान् उदाहरणानुसारं लिखत –
| पत्त्रं | ||
| पत्राय | पत्रेभ्याम् | पत्रेभ्यः |
| पुष्पम् | ||
| ______ | ______ | ______ |
चतुर्थी-विभक्तियुक्तपदानि स्थूलरेखया चिह्नतानि कुरुत पृथक्तया लिखत च –
ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय।
कोष्ठके प्रदत्तशब्दैः सह उचितविभक्तिं प्रयुज्य रिक्तस्थानानि पूरयत।
______ छात्रा: पठन्ति। (शिक्षक)
पंचमीविभक्तियुक्तपदं उदाहरणानुसारं चिह्नितं कुरुत –
यथा-काष्ठात् अग्निः जायते मध्यमानात्।
सत्यात् अपि हितं वदेत्।
कोष्ठकात् उचितं पदं चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत –
बालः ______ अङ्के उपविशति।
कोष्ठकात् उचितं पदं चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत –
वृक्षाः ______ आधारभूताः सन्ति ।
कोष्ठकात् उचितं पदं चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत –
______ रक्षणाय वृक्षाणाम् आरोपणम् आवश्यकम्।
कोष्ठकात् उचितं पदं चित्वा लिखत –
अद्य तु ______ अपि वृक्षाः न सन्ति।
उदाहरणमनुसृत्य अधोलिखितान् कोष्ठकान् यथायोग्यपदैः पूरयत –
यथा- जन
| जने | जन्योः | जनेषु |
राजन्
| ______ | ______ | ______ |
उदाहरणमनुसृत्य अधोलिखितान् कोष्ठकान् यथायोग्यपदैः पूरयत –
यथा- जन
| जने | जन्योः | जनेषु |
क्षमा
| ______ | ______ | ______ |
उदाहरणमनुसृत्य अधोलिखितान् कोष्ठकान् यथायोग्यपदैः पूरयत –
यथा- जन
| जने | जन्योः | जनेषु |
नदी
| ______ | ______ | ______ |
सप्तमीविभक्तियुक्तपदानि चित्वा लिखत –
परोक्षे कार्यहन्तारम्,
प्रत्यक्षे प्रियवादिनम्।
वर्ययेत् तादृशं मित्रम्,
विषकुम्भं पयोमुखम्॥

