मराठी
महाराष्ट्र राज्य शिक्षण मंडळएस.एस.सी (हिंदी माध्यम) इयत्ता ९ वी

‘मेरी अभिलाषा’ लगभग छह से आठ पंक्तियों में लिखिए।

Advertisements
Advertisements

प्रश्न

‘मेरी अभिलाषा’ लगभग छह से आठ पंक्तियों में लिखिए।

सविस्तर उत्तर
Advertisements

उत्तर १

  1. सपनों की ऊँचाइयों को छूने की है अभिलाषा,
  2. मन से भरी है जिंदगी की हर एक आशा।
  3. हार नहीं मानूंगा, जीत ही मेरा लक्ष्य है।
  4. समर्पण से मैं अपने सपनों को पाऊंगा, यह तय है।
  5. मेरी अभिलाषा है ऊँचाइयों को छूना, सपनों को हकीकत में बदलना।
  6. सिखना, बढ़ना और बदलना, हर दिन कुछ नया सीखना है।
  7. साहसी और संघर्षी बनकर आगे बढ़ना है।
  8. सपनों को हासिल करने के लिए हर मुश्किल का सामना करना है।
  9. मेरी अभिलाषा है, इस जीवन को एक महान कहानी बनाना।
shaalaa.com

उत्तर २

मेरी अभिलाषा एक ऐसा सुनहरा सपना है, जो मुझे हर पल आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है। मैं अपने जीवन में सफलता की ऊँचाइयों को छूना चाहता हूँ और एक ऐसा इंसान बनना चाहता हूँ जो समाज के लिए उपयोगी हो। मेरा सपना है कि मैं न केवल अपने परिवार का नाम रोशन करूँ, बल्कि समाज में सकारात्मक बदलाव लाने वाला एक जागरूक नागरिक भी बनूँ।

मैं शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्टता प्राप्त करना चाहता हूँ ताकि ज्ञान के माध्यम से स्वयं को और दूसरों को आगे बढ़ा सकूँ। मेरी यही आकांक्षा है कि मैं अपने लक्ष्य के प्रति पूरी ईमानदारी और समर्पण से कार्य करूँ। कठिनाइयाँ चाहे जैसी भी हों, मैं डटकर उनका सामना करूँगा और कभी हार नहीं मानूँगा।
इस प्रकार, मेरी अभिलाषा ही मेरी प्रेरणा है, जो मुझे लगातार आगे बढ़ने, सीखने और समाज में कुछ अच्छा करने की दिशा में मार्गदर्शन देती है।

shaalaa.com
अपठित गद्यांश
  या प्रश्नात किंवा उत्तरात काही त्रुटी आहे का?
पाठ 2.14: रचना एवं व्याकरण विभाग - स्वाध्याय [पृष्ठ ११७]

APPEARS IN

बालभारती Hindi Kumarbharati Standard 9 Maharashtra State Board
पाठ 2.14 रचना एवं व्याकरण विभाग
स्वाध्याय | Q ४ | पृष्ठ ११७

संबंधित प्रश्‍न

निम्नलिखित गद्यांश पढ़कर ऐसे चार प्रश्न तैयार कीजिए, जिनके उत्तर गद्यांश में एक-एक वाक्य में हों:

        स्वाधीन भारत में अभी तक अंग्रेजी हवाओं में कुछ लोग यह कहते मिलेंगे – जब तक विज्ञान और तकनीकी ग्रंथ हिंदी में न हो तब तक कैसे हिंदी में शिक्षा दी जाए। जब कि स्वामी श्रद्धानंद स्वाधीनता से भी चालीस साल पहले गुरुकुल काँगड़ी में हिंदी के माध्यम से विज्ञान जैसे गहन विषयों की शिक्षा दे रहे थे। ग्रंथ भी हिंदी में थे और पढ़ाने वाले भी हिंदी के थे। जहाँ चाह होती है वहीं राह निकलती है। एक लंबे अरसे तक अंग्रेज गुरुकुल काँगड़ी को भी राष्ट्रीय आंदोलन का अभिन्न अंग मानते रहे। इसमें कोई संदेह भी नहीं कि गुरुकुल के स्नातकों में स्वाधीनता की अजीब तड़प थी। स्वामी श्रद्धानंद जैसा राष्ट्रीय नेता जिस गुरुकुल का संस्थापक हो और हिंदी शिक्षा का माध्यम हो; वहीं राष्ट्रीयता नहीं पनपेगी तो कहाँ पनपेगी। स्वामी जी से मिलने देश के प्रमुख राष्ट्रीय नेता भी गुरुकुल आते रहते थे।


निम्नलिखित पठित गद्यांश पढ़कर दी गई सूचनाओं के अनुसार कृतियाँ कीजिए:

आने वाली महिला की तबीयत थोड़ी खराब थी और पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल में उनका इलाज होना था। चूँकि वह मेरी बुआ जी को जानते थे और बुआ जी के छोटे भाई का परिवार पटना में था इसलिए ये तो सोचने की बात नहीं थी कि वह कहाँ रहेंगे। वह बिना किसी पूर्व सूचना के हमारे घर पहुँच गए थे। उनकी ट्रेन तो शाम को थी, लेकिन ट्रेन के टाइम से न चलने का बुरा कौन मानता है।

ट्रेन पाँच घंटे लेट पहुँची थी और हमारे वह मेहमान बिना खाए-पिए आधी रात में हमारे घर पहुँच गए थे।

फटाफट खाना बना। सोने का जुगाड़ हुआ।
और सुबह उन्हें अस्पताल पहुँचाने का भी।

वे कोई सप्ताह भर हमारे घर रहे। हम खूब घूल-मिल गए। हम रोज ठहाके लगाते, साथ खाते और पूरी मस्ती करते। ऐसा लग रहा था, मानो हम सदियों से एक-दूसरे को जानते हों। बुआ जी ने तिल की मिठाई भेजी थी। दिल्‍ली में उसे गजक कहते हैं, हमारे यहाँ सब तिलकुंट कहते थे। हम सबने तिल और गुड़ की उस मिठाई को खूब मजे लेकर खाया। हमारी बुआ जी सारे संसार का ख्याल रखती थीं और भाई-भतीजों में तो उनकी आत्मा ही बसती थी।

उन्होंने अपने परिचित भेज दिए, हमने उन्हें रिश्तेदार बना लिया।
आप जानकर हैरान रह जाएँगे कि हम दुबारा कभी उन रिश्तेदारों से नहीं मिल पाए जो उस रात हमारे घर आए थे। लेकिन हम सभी भाई-बहनों के जेहन में उस रिश्ते की याद आज भी ताजा है। हम आज भी उनके आने और अपनी रजाई छिन जाने को याद कर खुश होते हैं।

(1) कृति पूर्ण कीजिए:   (2)

(i)

(ii)

(2) उत्तर लिखिए:   (2)

  1. बुआ जी की आत्मा बसती थी - .....................
  2. आने वाली महिला की तबीयत थी - .....................
  3. बुआ जी खयाल रखती थीं - .....................
  4. अतिथि लेखक के घर रहे - .....................

(3) ‘संयुक्त परिवार’ इस विषय पर 30 से 40 शब्दों में अपने विचार लिखिए।   (3)


निम्नलिखित अपठित गद्यांश पढ़कर दी गई सूचनाओं के अनुसार कृतियाँ कीजिए:

             हमेशा यह कहा जाता है कि जीवन में जितनी भी तकलीफ हो, पीड़ा हो, दुख हो, कष्ट हो, हमें बहुत धैर्यपूर्वक इन सभी का प्रतिकार करना चाहिए। दुख के समय या विपत्ति के समय हमें बहुत शांत रहकर इनको सहन करना चाहिए, क्योंकि संसार में यह धारणा बहुत साफ दिखती है कि व्यक्ति अपने मन की व्यथा को खुद संभालकर रखे, नहीं तो वह उपहास का पात्र भी बन सकता है। यदि हम अपने मन की बातों या दुख होने पर इसे समाज के साथ बाँटते हैं, तो कुछ लोग इस पर ध्यान नहीं देते, अपितु वह इन्हें एक सामान्य सी बात कहकर मजाक भी बना डालते हैं। अत: कहा भी गया है-

रहिमन निज मन की व्यथा, मन में राखो गोय।
सुनि इठलैहैं लोग सब, बाटि न लैहैं कोय।।

(1) उत्तर लिखिए- (2)

समाज में लोगों की विशेषताएँ-

  1. ______
  2. ______

(2) मन की प्रवृत्ति पर अपने विचार 25 से 30 शब्दों में लिखिए। (2)


निम्नलिखित अपठित गद्यांश पढ़कर दी गई सूचनाओं के अनुसार कृतियाँ कीजिए।

      मधुरता सत्य का अनुपान है और मितता उसका पथ्य है। जिसे हम सम्यक वाणी कहते हैं; वह सत्य, मित और मधुर होती है और वही परिणामकारक भी होती है। समाज का हित किस बात में है, समझना कभी कठिन हो सकता है। परंतु सम्यक वाणी से ही  वह सधेगा, यह किसी भी आदमी के लिए समझना कठिन नहीं होना चाहिए।

      परंतु यही आज भारी हो रहा है। समाजहित के नाम पर कार्यकर्ताओं की वाणी दूषित हो गई हैं, अर्थात मन ही दूषित हो गया है। फिर कृति कैसे भूषित हो सकती है?

      आज लेखन व भाषण के साधन सुलभतम हो गए हैं। परंतु शायद इसी कारण सभ्य वाणी दुर्लभ हो गई है। सभ्य वाणी को खोकर सुलभ साधनों की प्राप्ति करना यानी कवि की भाषा में नेत्र बेचकर चित्र खरीदने जैसा है।

(1) संजाल पूर्ण कीजिए: (2)

(2) ‘वाणी : मनुष्य को प्राप्त वरदान’ इस विषय पर 25 से 30 शब्दों में अपने विचार लिखिए। (2)


निम्नलिखित अपठित गद्यांश पढ़कर सूचना के अनुसार कृतियाँ पूर्ण कीजिए:

          एक बार अंग्रेजी के मशहूर साहित्यसेवी डॉ. जॉनसन के पास उनका एक मित्र आया और अफसोस जाहिर करने लगा कि उसे धार्मिक ग्रंथ पढ़ने के लिए समय ही नहीं मिलता।

          “क्यों?” डॉ. जॉनसन ने फौरन पूछा।

           “आप ही देखिए, दिन-रात मिलाकर सिर्फ चौबीस घंटे होते हैं, इसमें से आठ घंटे तो सोने में निकल जाते हैं।”

          “पर यह बात सब ही के लिए लागू है।” डॉ. जॉनसन ने कहा।

          “और करीब आठ ही घंटे ऑफिस में काम करना पड़ता है।”

           “और बाकी आठ घंटे?” डॉ. जॉनसन ने पूछा।

          “इन्हीं आठ घंटों में खाना-पीना, हजामत बनाना, नहाना-धोना, ऑफिस आना-जाना, मित्रों से मिलना-जुलना, चिट्ठी-पत्री का जबाब देना, इत्यादि कितने काम रहते हैं। मैं तो बड़ा परेशान हूँ।”

          “तब तो मुझे भी अब भूखों मरना पड़ेगा।” डॉ. जॉनसन एक गहरी साँस लेकर बोले।

          “क्यों? क्यों?” उनके मित्र ने तुरंत पूछा।

          “मैं काफी खाने वाला आदमी हूँ और अन्न उपजाने के लिए दुनिया में एक चौथाई ही तो जमीन है, तीन-चौथाई तो पानी ही है और संसार में मेरे जैसे करोड़ों लोग हैं जिन्हें अपना पेट भरना पड़ता है।”

          “पर इतने लोगों के लिए फिर तो भी जमीन काफी है।”

          “काफी कहाँ है? इस एक-चौथाई जमीन में कितने पहाड़ हैं, ऊबड़-खाबड़ स्थल हैं, नदी-नाले हैं, रेगिस्तान और बंजर भूमि हैं। अब मेरा भी कैसे निभ सकेगा भगवान! मित्र महोदय बड़ी हमदर्द के साथ डॉ. जॉनसन को दिलासा देने लगे कि उन्हे परेशान होने की बिल्कुल जरूरत नहीं है। दुनिया में करोड़ों लोग रहते आए हैं और उन्हें सदा अन्न मिलता ही रहा है।”

(१) तालिका पूर्ण कीजिए: (२)

(२) परिच्छेद में आए हुए शब्दयुग्म के कोई भी चार उदाहरण ढूँढ़कर लिखिए: (२)

  1. ______
  2. ______
  3. ______
  4. ______

(३) ‘समय अनमोल है’ इस विषय पर अपने विचार ४० से ५० शब्दों में लिखिए। (२)


निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर इसके आधार पर सर्वाधिक उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प चुनकर लिखिए -

    साहित्य को समाज का प्रतिबिंब माना गया है अर्थात समाज का पूर्णरूप साहित्य में प्रतिबिंबित होता रहता है। अनादि काल से साहित्य अपने इसी धर्म का पूर्ण निर्वाह करता चला आ रहा है। वह समाज के विभिन्न रूपों का चित्रण कर एक ओर तो हमारे सामने समाज का यथार्थ चित्र प्रस्तुत करता है और दूसरी ओर अपनी प्रखर मेधा और स्वस्थ कल्पना द्वारा समाज के विभिन्न पहलुओं का विवेचन करता हुआ यह भी बताता है कि मानव समाज की सुख-समृद्धि, सुरक्षा और विकास के लिए कौन-सा मार्ग उपादेय है? एक आलोचक के शब्दों में - "कवि वास्तव में समाज की व्यवस्था, वातावरण, धर्म-कर्म, रीति-नीति तथा सामाजिक शिष्टाचार या लोक व्यवहार से ही अपने काव्य के उपकरण चुनता है और उनका प्रतिपादन अपने आदर्शों के अनुरूप करता है।”

     साहित्यकार उसी समाज का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें वह जन्म लेता है। वह अपनी समस्याओं का सुलझाव, अपने आदर्श की स्थापना अपने समाज के आदर्शों के अनुरूप ही करता है। जिस सामाजिक वातावरण में उसका जन्म होता है, उसी में उसका शारीरिक, बौद्धिक और मानसिक विकास भी होता है। अत: यह कहना सर्वथा असंभव और अविवेकपूर्ण है कि साहित्यकार समाज से पूर्णतः निरपेक्ष या तटस्थ रह कर साहित्य सृजन करता है। वाल्मीकि, तुलसी, सूर, भारतेंदु , प्रेमचंद आदि का साहित्य इस बात का सर्वाधिक सशक्त प्रमाण है कि साहित्यकार समाज से घनिष्ठ रूप से संबंध रखता हुआ ही साहित्य सृजन करता है। समाज की अवहेलना करने वाला साहित्य क्षणजीवी होता है।

  1. साहित्य समाज का प्रतिबिंब है क्योंकि यह -
    (A) समाज की वास्तविकता का द्योतक है।
    (B) समाज में लोक व्यवहार का समर्थक है।
    (C) व्यक्ति की समस्याओं का निदान करता है।
    (D) साहित्य को दिशा प्रदान करता है।
  2. गद्यांश दर्शाता है -
    (A) समाज एवं साहित्य का पारस्परिक संबंध
    (B) समाज एवं साहित्य की अवहेलना
    (C) साहित्यकार की सृजन शक्ति
    (D) सामाजिक शिष्टाचार एवं लोक व्यवहार
  3. साहित्य की क्षणभंगुरता का कारण होगा -
    (A) सामाजिक अवज्ञा
    (B) सामाजिक समस्या
    (C) सामाजिक सद्भाव
    (D) सामाजिक समरसता
  4. वाल्मीकि, तुलसी, सूर के उदाहरण द्वारा लेखक चाहता है -
    (A) भाव साम्यता
    (B) प्रत्यक्ष प्रमाण
    (C) सहानुभूति
    (D) शिष्टाचार
  5. निम्नलिखित कथन (A) तथा कारण (R) को ध्यानपूर्वक पढ़िए। उसके बाद दिए गए विकल्पों में से कोई एक सही विकल्प चुनकर लिखिए।
    कथन (A) - कवि अपने काव्य के उपकरणों का प्रतिपादन अपने आदर्शों के अनुरूप करता है।
    कारण (R) - कवि हृदय अत्यधिक संवेदनशील होता है एवं सदैव देशहित चाहता है।
    (A) कथन (A) तथा कारण (R) दोनों गलत है।
    (B) कथन (A) गलत है लेकिन कारण (R) सही है।
    (C) कथन (A) सही है लेकिन कारण (R) उसकी गलत व्याख्या करता है।
    (D) कथन (A) तथा कारण (R) दोनों सही हैं तथा कारण (R) कथन (A) की सही व्याख्या करता है।

निम्नलिखित अपठित गद्यांश पढ़कर दी गई सूचनाओं के अनुसार कृतियाँ कीजिए:

यह एक 'साधारण महिला' की असाधारण कहानी है, जो अपनी असाधारण पारिवारिक पृष्ठभूमि से प्रोत्साहन व प्रेरणा लेकर सफलता के शिखर पर पहुँची है।

वहाँ अंतरिक्ष में रहते हुए सुनीता का मन बारिश में भीगने, समुद्र या झील या फिर सरोवर में तैरने को कर रहा था। दरअसल अंतरिक्ष में रहते हुए हरदम गंदगी-सी महसूस होती है। भारहीनता के कारण पसीने की बूँद त्वचा से चिपकी रहती हैं। और धीरे-धीरे इकट्ठा होकर त्वचा को छोड़ देती हैं, लेकिन किसी चीज से टकराने से पहले वे इधर - इधर तैरती सी रहती हैं।

कभी-कभी सुनीता का पृथ्वी को स्पर्श करने का मन करता था। वह अपोलो के अंतरिक्ष यात्रियों के बारे में सोचने लगती थी और यह सोचती थी कि चंद्रमा पर पूरी तरह उतरने से पहलें ही पृथ्वी पर वापस आना उन्हें कितना निराशाजनक लगा होगा।

रात से पृथ्वी जैसे टिमटिमाने लगती थी और जो क्षेत्र दिन में वीरान दिखाई दे रहे थे, वे चमत्कारी रूप से छोटी-छोटी बत्तियों के प्रकार से जगमगा उठते थे। ऐसे में सुनीता का जी करता था, 'समुद्र मैं डुबकी लगाने का।

(1) कृति पूर्ण कीजिए :    (2)

(2) कृति पूर्ण कीजिए :    (2)

(3) परिवार से प्रोत्साहन तथा प्रेरणा का महत्त्व' विषय पर 25 से 30 शब्दों में अपने विचार लिखिए।    (2)


निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर इस पर आधारित प्रश्नों के सर्वाधिक वाले विकल्प चुनकर लिखिए।

अठारह साल के युवा ग्रैंडमास्टर आर. प्रज्ञाननंदा इन दिनों छाए हुए हैं। पाँच बार विश्व चैंपियन रहे मैग्नस कार्लसन के साथ शतरंज वर्ल्ड कप का अंतिम मुकाबला भले ही वह नहीं जीत पाए। पर, कम उम्र में ही सफलता और उम्मीदों का भारी ताज वह पहन चुके हैं। उनकी सादगी, शालीनता पसंद की जा रही है। अच्छी बात है कि वे हार-जीत दोनों में सहज दिखते हैं। बीते साल एक ऑनलाइन शतरंज टूर्नामेंट में कार्लसन को हराने के बाद प्रज्ञान ने कमाल बात कही। उन्होंने कहा, 'यह केवल एक जीत है, कोई अंतिम नहीं। आगे कई चुनौतियाँ हैं। बहुत कुछ करना है। यही हार के साथ होता है। किसी एक हार से सब खत्म नहीं हो जाता।'

अब सवाल यह है क्या अपनी सफलता की खुशी मनाना गलत है? माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स कहते हैं, 'सफलता की खुशी मनाने में हर्ज नहीं है। पर ज्यादा जरूरी है कि हम असफलताओं के सबक पर भी ध्यान देते रहें।'

सफलता के साथ बहुत कुछ बदलता है। कभी हम बदल जाते हैं तो कभी दूसरे। कितनी ही बार तो हमें अपने से आगे दिखना ही बंद हो जाता है। इस कारण कभी हम अतिआत्मविश्वास के शिकार होकर जरूरी मेहनत नहीं करते, तो कभी दूसरों से हमारे रिश्ते खराब हो जाते हैं। ऐसे में सबसे पहले अपने घमंड और आक्रामक होने की इच्छा को काबू करना जरूरी हो जाता है।

कितनी ही प्रतिभाएँ एक-दो बड़ी जीत की चमक-धमक में ही अटक कर रह जाती है। या समझ नहीं आता कि आगे क्या? ऐसे में सहजता ही हमारी उपलब्धियों के कद को बढ़ाती है। हम विनम्र रहें, सफलता की चाह हो और मेहनत करने में आगे रहें। ध्यान प्रक्रिया पर हो । हम नतीजा भले ही हार जाएँ, पर हमारा उत्साह हमेशा बना रहे।

  1. निम्नलिखित कथन तथा कारण को ध्यानपूर्वक पढ़िए। उसके बाद दिए गए विकल्प में से कोई एक सही विकल्पों चुनकर लिखिए।    [1]   

    कथन:
    सफलता के मद में हमें अपने से आगे दिखना ही बंद हो जाता है।
    कारण: हम अति आत्मविश्वास के शिकार होकर जरूरी मेहनत नहीं करते।
    1. कथन तथा कारण दोनों गलत हैं।
    2. कथन गलत हैं लेकिन कारण सही है।
    3. कथन सही है लेकिन कारण उसकी गलत व्याख्या करता है।
    4. कथन तथा कारण दोनों सही हैं तथा कारण, कथन की सही व्याख्या करता है।
  2. सफलता प्राप्ति के बाद किसे अपने नियंत्रण में रखना आवश्यक है?   [1] 
    1.  दूसरों के प्रति अपने व्यवहार को
    2.  अहंकार और आक्रोश की इच्छा को
    3. आत्मविश्वास और जीत की खुशी को
    4.  अपने प्रति दूसरों के व्यवहार को
  3. बिल गेट्स के अनुसार सफलता की खुशी मनाने से अधिक आवश्यक है:   [1] 
    1. असफलताओं की चुनौतियों को स्वीकारना
    2. असफलताओं के कारणों पर ध्यान देना
    3.  नए लक्ष्य के लिए संघर्ष करना
    4. असफलताओं से शिक्षा ग्रहण करना
  4. 'किसी एक हार से सब खत्म नहीं हो जाता' - पंक्ति का आशय है:    [1] 
    1. जीत-हार जीवन के दिन और रात हैं।
    2. असफल होने से जीवन समाप्त नहीं होता।
    3. हार के बाद जीत अवश्य आती है।
    4. लक्ष्य प्राप्ति के लिए संघर्ष करना चाहिए।
  5. प्रज्ञाननंदा की प्रसिद्धि का कारण है:     [1] 

    1. कम उम्र में शतरंज के क्षेत्र में नाम कमाना
    2. उनकी सादगी, सरलता और शालीनता
    3. हार-जीत को समान भाव से स्वीकारना
    4. जीवन को चुनौती के रूप में स्वीकरना

Read the extract given below and answer in Hindi the questions that follow:

निम्नलिखित अवतरण को पढ़िए और उसके नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर हिन्दी में लिखिए:

लगभग एक सप्ताह यही क्रम चलता रहा। हर समय एक व्यक्ति उनके पास बैठा रहता। कभी माँ तो कभी मीनू, कभी रोहित तो कभी आशा। उन सबकी सेवा व ईश्वर के आशीर्वाद से पिताजी की दशा में काफी सुधार हो गया। अब वे धीरे-धीरे अपने आप बैठने भी लगे थे, और थोड़ी देर बातें भी कर लेते थे। प्रात: लगभग नौ बजे का समय था। उस समय हल्की वर्षा की बुँदें पड़ रही थी। तभी घर के बाहर एक कार आकर रुकी।
  1. 'पिताजी' को क्या हुआ था? डॉक्टर ने उन्हें क्या सलाह दी थी?      [2]
  2. कार से कौन आए थे और क्यों?     [2]
  3. बुआ जी जाते-जाते अपने भैया को क्या-क्या सलाह दे गई? क्या उपर्युक्त अवसर पर उनकी यह सलाह उचित थी? समझाइए।     [3]
  4. पिताजी द्वारा मीनू को शादी का सुझाव दिए जाने पर मीनू ने उन्हें क्या कहकर समझाया?    [3]

Read the extract given below and answer in Hindi the questions that follow:

निम्नलिखित अवतरण को पढ़िए और उसके नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर हिन्दी में लिखिए:

“यह सब समय का फेर है, दीदी! मेरे भाग्य में यही सब लिखा था। मुझे एक फैक्ट्री में नौकरी मिल गई थी। मैं अपने को बहुत खुशनसीब समझ रहा था कि मुझे इतनी छोटी उम्र में ही नौकरी मिल गई।"
  1. 'दीदी' कह कर किसे संबोधित किया गया है? वक्ता का संक्षिप्त परिचय दीजिए।   [2]
  2. 'समय का फेर' किसे कहा जा रहा है और इस समय के फेर से वक्ता पर क्या प्रभाव पड़ा था?    [2]
  3. 'दीदी' ने वक्ता की सहायता क्यों, कब और किस प्रकार से की थी?    [3]
  4. अवतरण में दी गई पंक्तियों के आधार पर उदाहरण सहित सिद्ध कीजिए कि मुसीबत में पड़े व्यक्ति की सहायता करना ही मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म और कर्तव्य होता है।  [3]

Share
Notifications

Englishहिंदीमराठी


      Forgot password?
Use app×