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“य आत्मनः ..... अचिरेण सः' अस्य श्लोकस्य आशयं हिन्दी भाषया स्पष्टीकुरुत । - Sanskrit (Elective)

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प्रश्न

“य आत्मनः ..... अचिरेण सः' अस्य श्लोकस्य आशयं हिन्दी भाषया स्पष्टीकुरुत ।

दीर्घउत्तर
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उत्तर

प्रसंग-
यह पद्यांश कक्षा 11 वी की संस्कृत पाठ्यपुस्तक शाश्वती के चतुर्थ अध्याय से लिया गया है | इस पाठ में विदुरा अपने पुत्र को युद्ध के लिए उतसाहित करती है विदुरा का पुत्र एक बार युद्ध हार गया और अब वह युद्ध नहीं करना चाहता है इस बात को सुन विदुरा सभी तरह से युद्ध के लिए प्रोत्साहित कर रही है | इस पाठ का आधार ग्रन्थ महाभारत है | सी पद्यांश में कहा गया है की जो राजा अपने सुख के विषय में न सोच कर प्रजा के विषय में सोचता है वह राज्य का गोरव बढ़ा देता है |
 
व्याख्याः-
इस पाठ में विदुरा अपने पुत्र को प्रोत्साहित करती हुई कहती है की हे पुत्र मेरी बात को ध्यान से सुनो वह मनुष्य या वह रजा जो केवल स्वयं के विषय में सोचता है वह राजा सुखी नहीं रहता है एवं तिरस्कार का अधिकारी भी हो जाता है प्रजा एवं समाज ऐसे राजा को ही समान देती है जो रजा स्वयं के सुख एवं सुविधा के बारे में विचार न कर के प्रजा के सुख के विषय में अधिक सोचता है एवं कार्य भी प्रजा के हित में करता है | और जो राजा इस प्रकार का व्यवहार करता है वह राजा अपने राज्य एवं मंत्री गण के हर्ष को भी बढाता है क्यूंकि स्वयं के विषय में तो एक आम जन भी सोचता है राजा उन आम जन से किस प्रकार भिन्न है इसी प्रकार की वह अपने सुख के विषय में नहीं सोचता है वह कार्य करने के पूर्व यह नहीं सोचता की उसे किसी प्रकार का दुःख होगा एवं किसी प्रकार शारीरक कष्ट होगा वह सोचता है की इसे प्रजा को क्या लाभ होगा एवं प्रजा को तो किसी प्रकार का कष्ट नहीं होगा ऐसा राजा ही लोकप्रिय राजा कहलाता है |
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मानो हि महतां धनम्
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अध्याय 4: मानो हि महतां धनम् - अभ्यासः [पृष्ठ २३]

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एनसीईआरटी Sanskrit - Shashwati Class 11
अध्याय 4 मानो हि महतां धनम्
अभ्यासः | Q 2 | पृष्ठ २३

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