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संत तुकाराम के अभंग पढ़ाे और गाओ।

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प्रश्न

संत तुकाराम के अभंग पढ़ाे और गाओ।

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उत्तर

१. समचरण दृष्टि विटेवरी साजिरी। तेथें माझी हरी वृत्ति राहो।।
आणिक न लगे मायिक पदार्थ। तेथें माझें अति नको देवा।।
ब्रम्हादिक पदें दु:खाची शिराणी। तेथें दुश्चित झणी जडों देसी।।
तुका म्हणे त्याचें कळलें आम्हां वर्म। जे जे कर्म धर्म नाशवंत।।

२. सुंदर तें ध्यान उभे विटेवरी। कर कटावरी ठेवूनियां।।
तुळसीचे हार गळा कासे पितांबर। आवडे निरंतर तें चि रूप।।
मकरकुंडलें तळपती श्रवणीं। कंठी कौस्तुभमणि विराजित।।
तुका म्हणे माझें हें चि सर्व सुख। पाहीन श्रीमुख आवडीनें।।

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उपयोजित / रचनात्मक लेखन (लेखन कौशल)
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अध्याय 1.07: मेरा अहोभाग्य - मेरा अहोभाग्य [पृष्ठ १७]

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बालभारती Hindi Sulabhbharati Standard 6 Maharashtra State Board
अध्याय 1.07 मेरा अहोभाग्य
मेरा अहोभाग्य | Q (६) | पृष्ठ १७

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“कोई काम छोटा नहीं। कोई काम गंदा नहीं। कोई भी काम नीचा नहीं। कोई काम असंभव भी नहीं कि व्यक्ति ठान ले और ईश्वर उसकी मदद न करे। शर्त यही है कि वह काम, काम का हो। किसी भी काम के लिए ‘असंभव’, ‘गंदा’ या ‘नीचा’ शब्द मेरे शब्दकोश में नहीं है।” ऐसी वाणी बोलने वाली मदर टेरेसा को कोढ़ियों की सेवा करते देखकर एक बार एक अमेरिकी महिला ने कहा, “मैं यह कभी नहीं करती।” मदर टेरेसा के उपरोक्त संक्षिप्त उत्तर से वह महिला शर्म से सिकुड़ गई थी। सचमुच ऐसे कार्य का मूल्य क्या धन से आँका जा सकता है या पैसे देकर किसी की लगन खरीदी जा सकती है? यह काम तो वही कर सकता है, जो ईश्वरीय आदेश समझकर अपनी लगन इस ओर लगाए हो। जो गरीबों, वंचितों, जरूरतमंदों में ईश्वरीय उपासना का मार्ग देखता हो और दुखी मानवता में उसके दर्शन करता हो। ईसा, गांधी, टेरेसा जैसे परदुखकातर, निर्मल हृदयवाले लोग ही कोढ़ियों और मरणासन्न बीमारों की सेवा कर सकते हैं और ‘निर्मल हृदय’ जैसी संस्थाओं की स्थापना करते हैं।

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