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"लोग कहै, मीरां भइ बावरी, न्यात कहै कुल-नासी" - मीरा के बारे में लोग (समाज) और न्यात (कुटुंब) की ऐसी धारणाएँ क्यों हैं?

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प्रश्न

"लोग कहै, मीरां भइ बावरी, न्यात कहै कुल-नासी" - मीरा के बारे में लोग (समाज) और न्यात (कुटुंब) की ऐसी धारणाएँ क्यों हैं?

संक्षेप में उत्तर
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उत्तर

समाज मीरा के भक्ति भाव को समझ न सका। संसारी ने धन-दौलत, राजमहल, आभूषण, छप्पन प्रकार के भोजन, राजसी सुख आदि को सब कुछ माना था। उन्हें छोड़कर मीरा गलियों में भटक रही हैं। यह पागलपन ही तो है कि चित्तौड़ में राजमहल छोड़कर मंदिर में रहने लगीं, फिर वृंदावन में भटकीं और कृष्ण की आज्ञा से द्वारिका आईं, इसे लोगों ने पागलपन माना। न्यात ने कहा कि राजघराने का वंश चलाने के लिए मीरा ने सांसारिक धर्म को पूरा नहीं किया। इसलिए मीरा कुल का नाश करनेवाली कहलाईं। मीरा कृष्ण के प्रेम के सामने संसार को कुछ नहीं मानती थीं।

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मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई
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अध्याय 2.02: मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई - अभ्यास [पृष्ठ १३८]

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एनसीईआरटी Hindi Aaroh bhag 1 Class 11
अध्याय 2.02 मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई
अभ्यास | Q 4. | पृष्ठ १३८
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