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प्रश्न
कहानी के नाट्य रूपांतरण में संवादों का विशेष महत्व होता है। नीचे ईदगाह कहानी से संबंधित कुछ चित्र दिए जा रहे हैं। इन्हें देखकर संवाद लिखें-


लेखन कौशल
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उत्तर
| महमूद (पैसे गिनते हुए) | अरे, सुन। मेरे पास पूरे बारह पैसे हैं। |
| मोहसिन | और मेरे पास तो पंद्रह हैं। तेरे पास कितने हैं, हामिद? |
| हामिद | अभी तो मेरे पास कुछ भी नहीं है। अभी जाता हूँ घर, और लेकर आता हूँ दादी जान से। |
| महमूद | हाँ, हाँ। भाग कर जा। ईदगाह जाना है। बहुत दूर है वह यहाँ से। |
| हामिद-(कोठरी के दरवाज़े से) | दादी जान। सब मेला देखने जा रहे हैं। मुझे भी पैसे दो। मैं भी मेला देखने जाऊँगा। |
| अमीना (आँखें पोंछते हुए) | बेटा इतनी दूर वहाँ कैसे जाएगा? |
| हामिद (उत्साहपूर्वक) | सब के साथ। सभी तो जा रहे हैं। |
| अमीना (बटुआ खोलते हुए) | ले बेटा, तीन पैसे हैं। सँभल कर जाना। सब एक साथ रहना। |
| हामिद (उत्साह में भर कर) | नहीं दादी हम इकट्ठे ही रहेंगे। |
| मोहसिन | अरे तेज़-तेज़ चलो। हमें वहाँ जल्दी पहुँचना है। अरे देख तो |
| महमूद | कितने मोटे-मोटे आम लगे हैं इन पेड़ों पर। |
| हामिद | लीचियाँ भी लगी हैं। |
| मोहसिन | तोड़ें, इन्हें। |
| हामिद | अरे, नहीं। माली पीटेगा। |
| महमूद | देख तो इन्हें, कितनी बड़ी-बड़ी इमारतें हैं। |
| मोहसिन | हाँ। यह कॉलेज है और वह अदालत। कॉलेज में बड़े-बड़े आदमी पढ़ते हैं बड़ी-बड़ी मूँछों वाले। |
| हामिद | वे क्यों पढ़ते हैं अब तक? मेरे मदरसे में तो दो-तीन बड़े-बड़े लड़के पढ़ते हैं। रोज़ मार खाते हैं। कॉलेज में भी बड़े लड़के मार ही खाते होंगे। |
| महमूद | कितनी भीड़ है यहाँ तो? लोगों के कपड़े देख। कितने सुंदर हैं। और इतनी मोटरें। |
| मोहसिन (चिल्ला कर) | ओ! सामने देखा। कितनी बड़ी ईदगाह। |
| हामिद | सब लोग कतारों में खड़े हैं। इतने लोग। सब सिजदे में झुक रहे हैं। |
| महमूद | आओ, गले मिलेंगे। नमाज़ के बाद सब गले मिलते हैं। |
| मोहसिन | हाँ, हाँ। आओ हामिद तुम भी। |
| महमूद | अब तो हम खिलौने खरीदेंगे। |
| मोहसिन | अरे, यह भिश्ती देखो। झुकी हुई कमर है इसकी। इसकी मशक तो देख। |
| महमूद | मैं तो सिपाही लूँगा, बंदूक वाला। उसकी पगड़ी तो लाल है। ख़ाकी वर्दी पहने है। अरे नूरे तू क्या लेगा? |
| नूरा | मैं तो वकील लूँगा। काला चोला पहन रखा है उसने। हामिद, तू क्या लेगा? |
| हामिद | इन में से कुछ भी नहीं। मिट्टी के ही तो बने हैं। गिरते ही चकनाचूर। |
| मोहसिन | अरे, यह तो अपने पैसे बचा रहा है। |
| सम्मी | हाँ, इसके पास कुल तीन ही तो पैसे हैं। क्या लेगा बेचारा यह उन से। आओ, आओ। हम तो मिठाई खरीदेंगे। |
| हामिद (हाथ में चिमटा लिए हुए) | देखो, मैंने क्या खरीदा। |
| मोहसिन (हँस कर) | अरे, चिमटे का क्या करेगा? क्या इससे खेलेगा? |
| हामिद (चिमटा दिखाते हुए) | देखो तो सही। कितना मज़बूत है। लोहे का बना है। |
| मोहसिन | तो क्या? |
| हामिद (चिमटा नीचे फेंकते हुए) |
तू भी अपना भिशती नीचे ऐसे फेंक कर दिखा। टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा तेरा मिट्टी का खिलौना। |
| महमुद | तेरा चिमटा कोई खिलौना है |
| हामिद | और क्या! यह कंधे पर रखने से बंदूक है। यह फ़कीरों का चिमटा भी है और मंजीरा भी। |
| सम्मी | अरे, मेरी खंजरी देख ज़रा। |
| हामिद | मेरा चिमटा तो तेरी खंजरी का जब चाहे पेट फाड़ दे। इसके सामने तो सिपाही भी मिट्टी की बंदूक छोड़कर भाग जाएँ। |
| मोहसिन | हाँ भाई, इसका चिमटा तो रुस्तमे हिंद है। |
| महमूद | हामिद, तू मेरा खिलौना ले लो और मुझे अपना चिमटा दे दो। |
| हामिद | न भाई। मैं तो यह अपनी दादी के लिए लाया हूँ। रोटियाँ सेंकते हुए उसकी उंगलियाँ जल जाती थीं। |
| मोहसिन | बड़ा सयाना है, तू तो। |
| हामिद (दादी को चिमटा देते हुए)- | लो दादी चिमटा। मेले से तुम्हारे लिए लाया हूँ। अब तुम्हारी उंगलियाँ नहीं जला करेंगी। |
| (दादी हामिद को गले लगाती है।) | |
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