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Science (Hindi Medium) इयत्ता १२ - CBSE Question Bank Solutions

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कविता में कुछ पंक्तियाँ कोष्ठकों में रखी गई हैं- आपकी समझ से इसका क्या औचित्य है?

[1.04] रघुवीर सहाय : कैमरे में बंद अपाहिज
Chapter: [1.04] रघुवीर सहाय : कैमरे में बंद अपाहिज
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कैमरे में बंद अपाहिज करुणा के मुखौटे में छिपी क्रूरता की कविता है- विचार कीजिए।

[1.04] रघुवीर सहाय : कैमरे में बंद अपाहिज
Chapter: [1.04] रघुवीर सहाय : कैमरे में बंद अपाहिज
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हम समर्थ शक्तिवान और हम एक दुर्बल को लाएँगे पंक्ति के माध्यम से कवि ने क्या व्यंग्य किया है?

[1.04] रघुवीर सहाय : कैमरे में बंद अपाहिज
Chapter: [1.04] रघुवीर सहाय : कैमरे में बंद अपाहिज
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यदि शारीरिक रूप से चुनौती का सामना कर रहे व्यक्ति और दर्शक, दोनों एक साथ रोने लगेंगे, तो उससे प्रश्नकर्ता का कौन-सा उद्देश्य पूरा होगा?
[1.04] रघुवीर सहाय : कैमरे में बंद अपाहिज
Chapter: [1.04] रघुवीर सहाय : कैमरे में बंद अपाहिज
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परदे पर वक्त की कीमत है कहकर कवि ने पूरे साक्षात्कार के प्रति अपना नज़रिया किस रूप में रखा है?

[1.04] रघुवीर सहाय : कैमरे में बंद अपाहिज
Chapter: [1.04] रघुवीर सहाय : कैमरे में बंद अपाहिज
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यदि आपको शारीरिक चुनौती का सामना कर रहे किसी मित्र का परिचय लोगों से करवाना हो, तो किन शब्दों में करवाएँगी?

[1.04] रघुवीर सहाय : कैमरे में बंद अपाहिज
Chapter: [1.04] रघुवीर सहाय : कैमरे में बंद अपाहिज
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सामाजिक उद्देश्य से युक्त ऐसे कार्यक्रम को देखकर आपको कैसा लगेगा? अपने विचार संक्षेप में लिखें।
[1.04] रघुवीर सहाय : कैमरे में बंद अपाहिज
Chapter: [1.04] रघुवीर सहाय : कैमरे में बंद अपाहिज
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यदि आप इस कार्यक्रम के दर्शक हैं, तो टी.वी. पर ऐसे सामाजिक कार्यक्रम को देखकर एक पत्र में अपनी प्रतिक्रिया दूरदर्शन निदेशक को भेजें।
[1.04] रघुवीर सहाय : कैमरे में बंद अपाहिज
Chapter: [1.04] रघुवीर सहाय : कैमरे में बंद अपाहिज
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टिप्पणी कीजिएः गरबीली गरीबी, भीतर की सरिता, बहलाती सहलाती आत्मीयता, ममता के बादल।

[1.05] गजानन माधव मुक्तिबोध : सहर्ष स्वीकारा है
Chapter: [1.05] गजानन माधव मुक्तिबोध : सहर्ष स्वीकारा है
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इस कविता में और भी टिप्पणी-योग्य पद-प्रयोग हैं। ऐसे किसी एक प्रयोग का अपनी ओर से उल्लेख कर उस पर टिप्पणी करें।

[1.05] गजानन माधव मुक्तिबोध : सहर्ष स्वीकारा है
Chapter: [1.05] गजानन माधव मुक्तिबोध : सहर्ष स्वीकारा है
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व्याख्या कीजिएः
जाने क्या रिश्ता है, जाने क्या नाता है
जितना भी उँड़ेलता हूँ, भर-भर फिर आता है
दिल में क्या झरना है?
मीठे पानी का सोता है
भीतर वह, ऊपर तुम
मुसकाता चाँद ज्यों धरती पर रात-भर
मुझ पर त्यों तुम्हारा ही खिलता वह चेहरा है!

उपर्युक्त पंक्तियों की व्याख्या करते हुए यह बताइए कि यहाँ चाँद की तरह आत्मा पर झुका चेहरा भूलकर अंधकार-अमावस्या में नहाने की बात क्यों की गई है?

[1.05] गजानन माधव मुक्तिबोध : सहर्ष स्वीकारा है
Chapter: [1.05] गजानन माधव मुक्तिबोध : सहर्ष स्वीकारा है
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बहलाती सहलाती आत्मीयता बरदाश्त नहीं होती है- और कविता के शीर्षक सहर्ष स्वीकारा है में आप कैसे अंतर्विरोध पाते हैं। चर्चा कीजिए।

[1.05] गजानन माधव मुक्तिबोध : सहर्ष स्वीकारा है
Chapter: [1.05] गजानन माधव मुक्तिबोध : सहर्ष स्वीकारा है
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अतिशय मोह भी क्या त्रास का कारक है? माँ का दूध छूटने का कष्ट जैसे एक ज़रूरी कष्ट है, वैसे ही कुछ और ज़रूरी कष्टों की सूची बनाएँ।
[1.05] गजानन माधव मुक्तिबोध : सहर्ष स्वीकारा है
Chapter: [1.05] गजानन माधव मुक्तिबोध : सहर्ष स्वीकारा है
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प्रेरणा शब्द पर सोचिए और उसके महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए जीवन के वे प्रसंग याद कीजिए जब माता-पिता, दीदी-भैया, शिक्षक या कोई महापुरुष/महानारी आपके अँधेरे क्षणों में प्रकाश भर गए।

[1.05] गजानन माधव मुक्तिबोध : सहर्ष स्वीकारा है
Chapter: [1.05] गजानन माधव मुक्तिबोध : सहर्ष स्वीकारा है
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'भय' शब्द पर सोचिए। सोचिए कि मन में किन-किन चीज़ों का भय बैठा है? उससे निबटने के लिए आप क्या करते हैं और कवि की मनःस्थिति से अपनी मनःस्थिति की तुलना कीजिए।

[1.05] गजानन माधव मुक्तिबोध : सहर्ष स्वीकारा है
Chapter: [1.05] गजानन माधव मुक्तिबोध : सहर्ष स्वीकारा है
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तुम्हें भूल जाने की
दक्षिण ध्रुवी अंधकार-अमावस्या
शरीर पर, चेहरे पर, अंतर में पा लूँ मैं
झेलूँ मैं, उसी में नहा लूँ मैं
इसलिए कि तुमसे ही परिवेष्टित आच्छादित
रहने का रमणीय यह उजेला अब
सहा नहीं जाता है।

  1. यहाँ अंधकार-अमावस्या के लिए क्या विशेषण इस्तेमाल किया गया है उससे विशेष्य में क्या अर्थ जुड़ता है?
  2. कवि ने व्यक्तिगत संदर्भ में किस स्थिति को अमावस्या कहा है?
  3. इस स्थिति से ठीक विपरीत ठहरने वाली कौन-सी स्थिति कविता में व्यक्त हुई है? इस वैपरीत्य को व्यक्त करने वाले शब्द का व्याख्यापूर्वक उल्लेख करें।
  4. कवि अपने संबोध्य (जिसको कविता संबंधित है कविता का 'तुम') को पूरी तरह भूल जाना चाहता है, इस बात को प्रभावी तरीके से व्यक्त करने के लिए क्या युक्ति अपनाई है? रेखांकित अंशों को ध्यान में रखकर उत्तर दें।
[1.05] गजानन माधव मुक्तिबोध : सहर्ष स्वीकारा है
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कविता के किन उपमानों को देखकर यह कहा जाता है कि उषा कविता गाँव की सुबह का गतिशील शब्दचित्र है?
[1.06] शमशेर बहादुर सिंह : उषा
Chapter: [1.06] शमशेर बहादुर सिंह : उषा
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भोर का नभ
राख से लीपा हुआ चौका
(अभी गीला पड़ा है)

नयी कविता में कोष्ठक, विराम चिह्नों और पंक्तियों के बीच का स्थान भी कविता को अर्थ देता है। उपर्युक्त पंक्तियों में कोष्ठक से कविता में क्या विशेष अर्थ पैदा हुआ है? समझाइए।

[1.06] शमशेर बहादुर सिंह : उषा
Chapter: [1.06] शमशेर बहादुर सिंह : उषा
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अपनी रचना

अपने परिवेश के उपमानों का प्रयोग करते हुए सूर्योदय और सूर्यास्त का शब्दचित्र खींचिए।

[1.06] शमशेर बहादुर सिंह : उषा
Chapter: [1.06] शमशेर बहादुर सिंह : उषा
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आपसदारी

सूर्योदय का वर्णन लगभग सभी बड़े कवियों ने किया है। प्रसाद की कविता 'बीती विभावरी जाग री' और अज्ञेय की 'बावरा अहेरी' की पंक्तियाँ आगे बॉक्स में दी जा रही है। 'उषा' कविता के समानांतर इन कविताओं को पढ़ते हुए नीचे दिए गए बिंदुओं पर तीनों कविताओं का विश्लेषण कीजिए और यह भी बताइए कि कौन-सी कविता आपको ज़्यादा अच्छी लगी और क्यों?

  1. उपमान
  2. शब्दचयन
  3. परिवेश
बीती विभावरी जाग री!
अंबर पनघट में डुबो रही-
तारा-घट ऊषा नागरी।
खग-कुल कुल-कुल-सा बोल रहा
किसलय का अंचल डोल रहा,
लो यह लतिका भी भर लाई-
मधु मुकुल नवल रस गागरी
अधरों में राग अमंद पिए,
अलकों में मलयज बंद किए-
तू अब तक सोई है आली
आँखों में भरे विहाग री।
 -जयशंकर प्रसाद
भोर का बावरा अहेरी
पहले बिछाता है आलोक की
लाल-लाल कनियाँ
पर जब खींचता है जाल को बाँध लेता है सभी को साथः
छोटी-छोटी चिड़ियाँ, मँझोले परेवे, बड़े-बड़े पंखी
डैनों वाले डील वाले डौल के बैडौल
उड़ने जहाज़,
कलस-तिसूल वाले मंदिर-शिकर से ले
तारघर की नाटी मोटी चिपटी गोल धुस्सों वाली उपयोग-सुंदरी
बेपनाह काया कोः
गोधूली की धूल को, मोटरों के धुएँ को भी
पार्क के किनारे पुष्पिताग्र कर्णिकार की आलोक-खची तन्वि रूप-रेखा को
और दूर कचरा चलानेवाली कल की उद्दंड चिमनियों को, जो
धुआँ यों उगलती हैं मानो उसी मात्र से अहेरी को हरा देंगी।
- सच्चिदानंद हीरानंद वात्सयायन 'अज्ञेय'
[1.06] शमशेर बहादुर सिंह : उषा
Chapter: [1.06] शमशेर बहादुर सिंह : उषा
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