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प्रश्न
जीवन में अत्यधिक मोह से अलग होने की आवश्यकता है,इस वाक्य में व्यक्त भाव प्रकट कीजिए।
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उत्तर
अति सर्वत्र वर्जयेत। अर्थात किसी भी वस्तु, भाव आदि की अधिकता नहीं होनी चाहिए। यह उक्ति मोह के संदर्भ में भी अनुकरणीय है। किसी भी व्यक्ति अथवा वस्तु से अत्यधिक मोह अर्थात उसे पाने अथवा अपने नियंत्रण में रखने के लिए कुछ भी करने पर उतारू हो जाना दुख का कारण बन जाता है। जिस किसी से भी अत्यधिक मोह हो जाता है, उसे खोने की आशंका दुख का कारण बन जाती है। मोह मनुष्य के जीवन की स्वाभाविक प्रक्रिया है। परंतु दुखदायी है इसकी अधिकता। मोह ऐसा विकार है, जिसकी अधिकता मनुष्य के जीवन को संघर्षपूर्ण एवं कष्टकारी बनाती है मोह मनुष्य के जीवन को संघर्षपूर्ण एवं कष्टकारी बनाती है। मोह के वश में होकर मनुष्य विवेक से काम नहीं ले पाता। अपने प्रियजनों से मोह होना स्वाभाविक है। परंतु जो मोह हमारे विकास में बाधक बन रहा हो, वह त्याग के योग्य है। अनेक अवसरों पर देखा जाता है कि कई माता-पिता, दादा-दादी बच्चों के प्रति अत्यधिक मोह के कारण उन्हें आँखों से दूर नहीं करना चाहते। अपने नगर या कस्बे में उच्च शिक्षा की व्यवस्था न होने पर भी वे उन्हें बाहर जाकर अध्ययन के करने की मनाही कर देते हैं। बच्चे अपनी प्रतिभा के अनुसार उन्नति के करने से वंचित रह जाते हैं और यह पीड़ा जीवनपर्यंत उन्हें कष्ट ना पहुँचाया करती है।
