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प्रश्न
यह कविता तुलसीदास द्वारा रचित महाकाव्य रामचरितमानस के ‘बालकांड’ का एक अंश है जहाँ शिव धनुष के टूटने से क्रोधित परशुराम के रोष भरे वाक्यों का उत्तर लक्ष्मण व्यंग्य वचनों से देते हैं। दोनों के बीच के ये संवाद कविता में नाटकीयता उत्पन्न करते हैं। संवादों के माध्यम से ही पूरी कविता का कथात्मक विकास होता है, संवाद ही चरित्र का निर्माण करते हैं और संवादों से ही भावों में विविधता भी आती है। इस प्रकार यह कविता काव्यात्मक विधा में संवाद प्रस्तुति का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। नीचे कविता के संवादों की कुछ विशेषताएँ दी गई हैं। उन विशेषताओं को दर्शाने वाली पंक्तियों के उदाहरण कविता से ढूँढ़कर लिखिए।
संवादों की विशेषता
- राम की विनम्रता
- परशुराम का रौद्र रूप
- लक्ष्मण का प्रत्युत्तर
- पौराणिक संदर्भ
- नाटकीयता
विस्तार में उत्तर
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उत्तर
- राम की विनम्रता- नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा।। आयसु काह कहिअ किन मोही।
- परशुराम का रौद्र रूप- अति रिस बोले बचन कठोरा। बहु जड़ जनक धनुष के तोरा।। बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू। उलटउँ महि जहँ लहि तब राजू।।
- लक्ष्मण का प्रत्युत्तर- बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं। कबहु न असि रिस कीन्हि गोसाईं।। एहि धनु पर ममता केहि हेतू।
- पौराणिक संदर्भ- सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा। नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा।।
- नाटकीयता- आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही।। सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरि करनी करि क रअ लराई।
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