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प्रश्न
शुकशावकस्य आत्मकथां संक्षेपेण लिखत –
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उत्तर
कादम्बरी की कथा की भू शुक अपनी पूर्णकथा इस प्रकार सुनाता है –
मैं (शुकशावक) विन्ध्याटवी में पम्पा पद्मसरोवर के पश्चिमी तट पर स्थित शाल्मली वृक्ष पर अपने पिता के साथ रहता था। मेरा जन्म होते ही प्रसव वेदना से मेरी माता की मृत्यु हो गई। एक बार एक शबर सेना शिकार करने उधर आई। इस सेना में से एक वृद्ध शबर पीछे रह गया और उसने उस शाल्मली वृक्ष पर चढ़कर मेरे बूढ़े पिता की गर्दन मरोड़कर मृत्यु कर दी और उसे नीचे फेंक दिया। उसके पंखों में सिमटा हुआ मैं भी नीचे गिर गया किन्तु सूखे पत्तों के ढेर पर गिरने के कारण मेरे अंग नहीं टूटे तथा एक तमाल वृक्ष की जड़ में छिप जाने के कारण मैं उस शबर की दृष्टि से बच गया।
शबर के चले जाने पर मुझे प्यास लगी। तभी स्नान के लिए जाता हुआ हारीत नामक जाबालि ऋषि का पुत्र वहाँ से आ निकला। उसने प्यार से मुझे पानी पिलाया तथा छाया में बिठाया। स्नान करके वह मुझे अपने पिता महर्षि जाबालि के आश्रम में ले गया। यही है शुक शावक द्वारा वर्णित उसकी आत्मकथा।
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