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प्रश्न
- “प्रभु जी तुम घन बन, हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।”
उपर्युक्त पंक्ति के रेखांकित अंश पर ध्यान दीजिए। इसमें अनुप्रास अलंकार का प्रयोग किया गया है। जिस रचना में व्यंजन। वर्णों की आवृत्ति एक से अधिक बार होती है, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है।
- “प्रभु जी तुम मोती, हम धागा, जैसे सोने मिलत सुहागा।”
उपर्युक्त रेखांकित अंश में उपमा अलंकार है। किसी प्रसिद्ध वस्तु की समानता के आधार पर जब किसी वस्तु या व्यक्ति के रूप, गुण, धर्म का वर्णन किया जाता है तो वहाँ उपमा अलंकार होता है।
- “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा तुम्हरे चरन कमल एक भरोसा।”
उपर्युक्त रेखांकित अंश में रूपक अलंकार है। रूपक अलंकार वहाँ होता है जहाँ रूप और गुण की अत्यधिक समानता के कारण उपमेय में उपमान का आरोप कर अभेद स्थापित किया जाए।
अब आप अपनी पाठ्यपुस्तक में सम्मिलित कविताओं में अनुप्रास, उपमा और रूपक अलंकार वाली अन्य पंक्तियों को ढूँढ़कर लिखिए।
विस्तार में उत्तर
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उत्तर
- अनुप्रास अलंकार (एक ही व्यंजन की बार-बार आवृत्ति)
- “कनक-कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय।”
यहाँ ‘क’ वर्ण की बार-बार आवृत्ति है। - “गगन घन घमंड गरजत घोरा।”
‘ग’ और ‘घ’ वर्ण की पुनरावृत्ति से अनुप्रास बना है।
- “कनक-कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय।”
- उपमा अलंकार (जैसे, सा, समान आदि द्वारा तुलना)
- “उसका मुख चाँद सा सुंदर है।”
मुख की तुलना चाँद से की गई है। - “वह सिंह के समान वीर है।”
वीरता की तुलना सिंह से की गई है।
- “उसका मुख चाँद सा सुंदर है।”
- रूपक अलंकार (सीधा आरोप, बिना ‘जैसे’ के)
- “चरण कमल बंदौ हरि राई।”
यहाँ चरणों को कमल ही मान लिया गया है। - “जीवन एक संग्राम है।”
जीवन को सीधे संग्राम कहा गया है।
- “चरण कमल बंदौ हरि राई।”
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