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प्रश्न
निम्नलिखित विषय पर मौलिक कहानी लिखिए:
‘परिश्रमी मनुष्य कभी ईश्वर की कृपा से वंचित नहीं रह सकता।’
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उत्तर
मनुष्य मूल रूप से एक योगी है, विशेष रूप से कर्मयोगी। कर्म और निरंतर प्रयास के माध्यम से उसने अपने जीवन को सहज और सुखद बनाया है। इसके लिए उसे सदैव परिश्रम करना पड़ा है। उसने कठोर मेहनत से पर्वतों को काटकर मार्ग बनाए, पक्षियों की भाँति आकाश में उड़ान भरी और समुद्रों को पार कर अपने साम्राज्य की स्थापना की। आज वह दूरस्थ और कठिन मंगल ग्रह जैसे ग्रहों पर भी अधिकार स्थापित करने का प्रयास कर रहा है। यह सब कुछ आपसी सहयोग, लगन और कठोर परिश्रम का परिणाम है।
एक सामान्य मनुष्य भी, जो किसी कारणवश अभावों में जीवन व्यतीत करता है, अपने लक्ष्य को ध्यान में रखकर अपनी पूरी क्षमता के अनुसार परिश्रम करता है। आवश्यकता पड़ने पर वह अपने निकटतम लोगों का सहयोग लेता है। ऐसे व्यक्ति पर ईश्वर की विशेष कृपा बनी रहती है और अंततः उसे ईश्वर का प्रसाद अवश्य प्राप्त होता है।
इसी संदर्भ में एक घटना प्रस्तुत है। नगर से दूर स्थित एक गाँव में एक छोटा-सा विद्यालय था, जो बिना किसी सरकारी सहायता के संचालित होता था। विद्यालय का प्रबंधन इतना सक्षम नहीं था कि शिक्षकों को समय पर मानदेय दिया जा सके। फिर भी किसी प्रकार शिक्षक अपनी गृहस्थी चला रहे थे। उनमें से कुछ शिक्षक संयुक्त परिवारों से थे, इसलिए उन्हें अपेक्षाकृत कम कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। उन्हीं शिक्षकों में एक शिक्षक, श्री सी. चन्द्रा, अध्यापन कार्य के साथ-साथ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में निरंतर लगे रहते थे। कई बार आवेदन करने के लिए भी उनके पास धन नहीं होता था, तब वे अपने सहकर्मियों से सहयोग लेते थे। उन पर ईश्वर की कृपा बनी हुई थी और अंततः वह उससे वंचित नहीं रह सके। एक दिन उन्हें ईश्वर का प्रसाद प्राप्त हुआ और उन्होंने भारतीय प्रशासनिक सेवा में सफलता हासिल की।
अतः यह कथन पूर्णतः सत्य है कि परिश्रमी व्यक्ति कभी भी ईश्वर की कृपा से वंचित नहीं रहता।
