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प्रश्न
निम्नलिखित विषय पर हिन्दी में निबन्ध लिखिए जो लगभग 400 शब्दों से कम न हो:
किसी गलतफहमी के कारण कई वर्षों तक आपकी अपने एक अच्छे मित्र से बातचीत नहीं हुई। अब आप दोनों की बातचीत फिर से शुरू हो गई है। आपकी मित्रता में यह गलतफहमी क्यों उत्पन्न हुई तथा अब सब कुछ सामान्य हो जाने पर आप कैसा महसूस करते हैं? समझाकर लिखिए।
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उत्तर
प्रायश्चित
मैं उस समय बहुत छोटा था। मेरे पिता एक सरकारी कार्यालय में कार्यरत थे। उनका स्थानांतरण एक बड़े शहर में हो गया। उन्होंने अपनी छुट्टियों का उपयोग किया और लगभग एक सप्ताह तक एक होटल में ठहरकर शहर का परिचय प्राप्त किया, फिर किराए पर एक घर लिया। नया शहर होने के कारण सब कुछ अपरिचित था। लोग अनजान थे और सड़कों का भी कोई ज्ञान नहीं था।
कुछ दिन बीतने के बाद एक दिन माँ ने पिता से पूछा कि बच्चे को पढ़ने के लिए कहाँ भेजा जाएगा। पिता ने पड़ोस में जानकारी ली और अगले ही दिन मेरा प्रवेश एक विद्यालय में करा दिया गया। वहाँ मेरी एक अच्छे मित्र से पहचान हो गई। पढ़ते-लिखते और साथ आते-जाते समय कब बीत गया, पता ही नहीं चला। छुट्टियों के दिन मुझे बहुत बेचैन करते थे।
एक दिन अचानक मेरी तबीयत खराब हो गई। माँ ने मुझे उस दिन स्कूल न जाने को कहा और निर्देश दिया कि विद्यालय का कार्य अपने मित्र से कॉपी कर लेना। मैं मान गया। स्वस्थ होने के बाद जब मैंने उससे सामाजिक विज्ञान की कॉपी माँगी, तो उसने देने से इंकार कर दिया। उसका यह व्यवहार मुझे बहुत बुरा लगा। मैं उससे नाराज़ हो गया और उससे बात न करने का निश्चय कर लिया। जब भी वह विद्यालय, कक्षा या खेल के मैदान में मुझसे बात करने का प्रयास करता, मैं उससे दूरी बना लेता था।
कुछ दिनों बाद उसे अपनी माँ के साथ मामा के घर जाना पड़ा, क्योंकि वहाँ किसी की तबीयत खराब थी। उसे लौटने में लगभग एक सप्ताह लग गया। इस बीच कक्षा में कॉपियों का काम पूरा हो चुका था और अगले महीने वार्षिक परीक्षा होने वाली थी। उसका कार्य अधूरा रह गया था। उसने मेरी माँ से मेरी गणित और हिंदी की कॉपियाँ माँग लीं। उस समय मैं पिता के साथ बाजार गया हुआ था। मुझे यह भी पता नहीं चला कि उसने अपना काम पूरा करके मेरी दोनों कॉपियाँ वापस कर दी थीं और लौटाते समय कहा था कि अब वह अपना काम पूरा कर चुका है।
बाद में मुझे पुरानी बात याद आई और मैंने उससे कहा कि जब मैंने तुमसे सामाजिक विषय की कॉपी माँगी थी, तब तुमने देने से मना कर दिया था। यह सुनकर उसने बताया कि उस दिन उसका कार्य स्वयं अधूरा था। यह बात वह मेरे पिता के सामने कह रहा था, इसलिए मैं कुछ बोल नहीं सका। तब मुझे बहुत पछतावा हुआ कि मैंने बिना पूरी बात समझे ही मित्रता में दूरी बना ली और इतने दिन व्यर्थ गंवा दिए।
आज भी मैं स्वयं को पूरी तरह क्षमा नहीं कर पाया हूँ, लेकिन यह सोचकर प्रसन्न हूँ कि हमारी मित्रता आज भी बनी हुई है।
