कुछ घटनाएँ चाहे सुखद हों या दुःखद, मानव के स्मृति-पटल पर जीवनभर अंकित रहती हैं और कभी भुलाई नहीं जा सकतीं।
यह घटना बहुत पुरानी है, जब मैं किशोरावस्था में ही प्रवेश कर चुका था और कक्षा ग्यारह का छात्र था। फरवरी का महीना था और विद्यालय में वार्षिक परीक्षा के कारण अवकाश चल रहा था। मैंने और मेरी छोटी बहनों ने अपने मामा जी के घर जाने का निश्चय किया। उस समय साइकिल ही सबसे उपयुक्त और भरोसेमंद साधन मानी जाती थी, क्योंकि वह पक्के और कच्चे दोनों प्रकार के रास्तों पर समान रूप से चल सकती थी। मामा जी के घर जाने का मार्ग भी अधिकांशतः कच्चा ही था। इसलिए हमने तय किया कि सुबह साइकिल से ही निकलेंगे।
मैं प्रतिदिन जिस साइकिल से विद्यालय जाता था, उसी भरोसेमंद साइकिल को लेकर हम लगभग दस बजे तैयार होकर घर से निकले। यात्रा की शुरुआत अच्छी रही। कभी ठंडी हवा चलती, कभी रुक जाती। कभी धूप निकलती तो कभी बादलों की छाया मिल जाती। मुझे साइकिल चलाने का अच्छा अभ्यास भी था, इसलिए शुरुआत में कोई परेशानी नहीं हुई।
मेरी दो बहनें कक्षा नौ की छात्राएँ थीं और कुछ भारी शरीर वाली थीं। सबसे छोटी बहन कक्षा सात में पढ़ती थी और बहुत नन्ही-सी थी। माँ ने रास्ते के खर्च के लिए कुछ पैसे भी दिए थे। लेकिन उस दिन हमारा भाग्य कुछ और ही था। थोड़ी देर चलने के बाद, जब हम अपने गाँव से काफी दूर निकल चुके थे और लगभग डेढ़ किलोमीटर ही चले थे, तभी साइकिल का पिछला पहिया पंचर हो गया। तीनों को साइकिल लेकर पैदल चलना पड़ा। किसी तरह सड़क तक पहुँचे, साइकिल ठीक करवाई और फिर आगे बढ़े।
सड़क का सफर हमने प्रसन्नता के साथ तय किया, लेकिन तब तक दोपहर हो चुकी थी और धूप तेज़ थी। इसलिए कुछ देर विश्राम करने का निर्णय लिया। आगे का रास्ता लगभग बीस किलोमीटर का था और वह भी पूरी तरह कच्चा। सड़क सीधी थी, फिर भी चलना कठिन हो रहा था। कुछ ही किलोमीटर आगे बढ़े थे कि साइकिल फिर से पंचर हो गई। अब स्थिति और भी कठिन हो गई। चारों ओर कोई गाँव दिखाई नहीं दे रहा था, केवल खेत ही खेत फैले थे। सूर्य अस्त होने की ओर बढ़ रहा था और हमारे पैर भी जवाब देने लगे थे। चारों ओर देखने पर भी कोई सहारा नजर नहीं आ रहा था।
इसी बीच पीछे से एक व्यक्ति साइकिल से आता हुआ दिखाई दिया। पास आकर उसने पूछा कि हम कहाँ जा रहे हैं। यह सुनकर मेरी रूह काँप गई और दोनों बहनें डर गईं। मैंने डरते हुए कहा कि हम ऊँच इटालमाबाद जा रहे हैं।
उसने पूछा कि वहाँ किसके यहाँ जाना है। मैंने कहा,तिवारी जी के यहाँ। उसने कहा कि वह उन्हें जानता है और हमें अपने यहाँ रुकने का आग्रह करने लगा। उसके व्यवहार से मुझे ठीक महसूस नहीं हुआ, इसलिए हम तुरंत आगे बढ़ गए।
कुछ दूर आगे एक जलता हुआ दीपक दिखाई दिया। इससे मेरे मन में आशा जगी। वहाँ मुझे अपने ही उम्र का एक लड़का दिखा। मैंने झिझकते हुए उससे रुकने की अनुमति माँगी। उसने कहा कि वह हमें अपने घर ले जाएगा और बताया कि अमीन साहब उसके पिता हैं।
हम उनके पास पहुँचे तो शरीर थकान से टूट रहा था। शुरुआत में हम डरे हुए थे, लेकिन अपनी पूरी स्थिति बताई और मामा जी का नाम लिया। अमीन साहब ने कहा कि वे उन्हें जानते हैं। खाने-पीने की बात सुनकर भी मेरे मुँह से कुछ नहीं निकला, क्योंकि हम पूरे दिन भूखे थे। मेरी बहन ने ही किसी तरह सब्ज़ी बनाई और फिर रोटियाँ तैयार कीं, जिससे हमने भोजन किया।
इसी दौरान वही व्यक्ति, जो पहले रास्ते में मिला था, अपने कुछ साथियों को लेकर वहाँ आ गया। हमने कुछ नहीं कहा, लेकिन अमीन साहब ने स्वयं उन्हें मना कर दिया। वे लोग निराश होकर लौट गए। अगली सुबह हम मामा जी के घर के लिए निकल पड़े।
छुट्टियाँ समाप्त होने पर जब मैं अपने घर वापस आया, तो उस बालक से फिर मुलाकात हुई और मैंने उसे धन्यवाद दिया। उस समय मन में थोड़ा भय भी था, लेकिन यह विश्वास और गहरा हो गया कि संसार में आज भी ऐसे लोग हैं जो निस्वार्थ भाव से सहायता करते हैं और पूरी तरह निष्कलंक होते हैं। उनका यह उपकार मैं जीवनभर नहीं भूल सकता।
