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प्रश्न
‘निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल’ इस कथन की सार्थकता स्पष्ट कीजिए ।
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उत्तर
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल' अर्थात मातृभाषा ही सभी प्रकार की उन्नति का मुख्य आधार है। निज भाषा की उन्नति के बिना संपूर्ण विकास संभव नहीं है। बच्चे के जन्म के बाद उसका घर ही उसकी पहली पाठशाला होती है। भारतेंदु जी का यह कथन एकदम सही है कि अपनी भाषाकी उन्नति के बिना हर प्रकार की उन्नति महत्त्वहीन है। जहाँ अपने परिवार, समाज व देश के विकास में सहयोग करता है। हमें देश-विदेश के साहित्य का, कलाओं का जितना संभव हो, ज्ञान प्राप्त करना चाहिए, अन्य भाषाओं से ज्ञान प्राप्त कर उससे स्वयं को ज्ञानी बनाया जा सकता है, यह सब अपनी भाषा के ज्ञान से संभव होता है। व्यक्ति अन्य भाषा के ज्ञान को प्राप्त कर अपना ज्ञान तो बढ़ा सकता है। ज्ञान का प्रसार निज अर्थात अपनी भाषा में करना ही उचित होगा।
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क्रिया का लिंग और वचन सामान्यतः कर्ता और कर्म के लिंग और वचन के अनुसार निर्धारित होता है। वाक्य में कर्ता और कर्म के लिंग, वचन और पुरुष के अनुसार जब क्रिया के लिंग, वचन आदि में परिवर्तन होता है तो उसे अन्विति कहते हैं।
क्रिया के लिंग, वचन में परिवर्तन तभी होता है जब कर्ता या कर्म परसर्ग रहित हों;
जैसे- सवार कारतूस माँग रहा था। (कर्ता के कारण)
सवार ने कारतूस माँगे। (कर्म के कारण)
कर्नल ने वज़ीर अली को नहीं पहचाना। (यहाँ क्रिया, कर्ता और कर्म किसी के भी कारण प्रभावित नहीं है)
अतः कर्ता और कर्म के परसर्ग सहित होने पर क्रिया कर्ता और कर्म से किसी के भी लिंग और वचन से प्रभावित नहीं होती और वह एकवचन पुल्लिंग में ही प्रयुक्त होती है। नीचे दिए गए वाक्यों में ‘ने’ लगाकर उन्हें दुबारा लिखिए-
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लिखो :
पर्यायवाची शब्द :

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पथ
निम्न शब्द के पर्यायवाची शब्द लिखिए:

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रेखांकित शब्द से उपसर्ग और प्रत्यय अलग करके लिखिए:
लोग उनकी असफलता पर क्या-क्या टिप्पणी करेंगे।
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उचित विराम चिह्न लगाओ:
कामायनी महाकाव्य कवि जयशंकर प्रसाद
चित्र देखकर संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया इन शब्द के भेदों के आधार पर उचित वाक्य बनाओ और तालिका में शब्द लिखाे:
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| ; |
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