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प्रश्न
“मैं रजाई में पड़ा-पड़ा घर में चल रही गतिविधियों का अनुमान लगाता रहा।”
कहानी में बच्चे ने अनेक प्रकार के अनुमान लगाए हैं। क्या आपने कभी किसी अनदेखे व्यक्ति/वस्तु/पशु-पक्षी/स्थान आदि के विषय में अनुमान लगाए हैं? किसके बारे में? क्या? कब? विस्तार से बताइए।
(संकेत – जैसे पेड़ से आने वाली आवाज सुनकर किसी प्राणी का अनुमान लगाना; कहीं दूर रहने वाले किसी संबंधी/रिश्तेदार के विषय में सुनकर उसके संबंध में अनुमान लगाना।)
विस्तार में उत्तर
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उत्तर
हाँ, मैंने भी कई बार अनदेखी चीज़ों के बारे में अनुमान लगाए हैं।
- एक बार मैं घर पर पढ़ रहा था। तभी खिड़की के बाहर से एक बहुत मीठी आवाज़ आई “कुहू-कुहू, कुहू-कुहू। मैं खिड़की तक गया, पर कोई नहीं दिखा। मैंने अनुमान लगाया कि यह आवाज़ कोयल की ही होगी, क्योंकि सिर्फ कोयल ही ऐसी मीठी आवाज़ निकालती है। जब मैंने ध्यान से पेड़ की डालियों में देखा, तो सचमुच वहाँ एक कोयल बैठी थी। मेरा अनुमान बिलकुल सही निकला।
- एक रात मुझे नींद नहीं आ रही थी। तभी छत से हल्की आहट आई “टप-टप”। फिर कुछ खिसकने की आवाज़ भी। मैंने अनुमान लगाया कि यह बिल्ली है, जो शिकार की तलाश में घूम रही है। सुबह छत पर जाकर देखा तो वाकई वहाँ बिल्ली बैठी थी। मेरा अनुमान फिर सही निकला।
- मैंने अनदेखे व्यक्ति के बारे में भी अनुमान लगाया है। मुझे अपनी मौसी से कभी नहीं मिला था, क्योंकि वे मुंबई में रहती थीं। घर में सब उनके बारे में बताते थे कि वे बहुत खुशमिज़ाज हैं और मीठी बातें करती हैं। इन बातों को सुनकर मैंने अनुमान लगाया कि मौसी मुझसे बहुत प्यार करेंगी। होली की छुट्टियों में जब वे घर आईं, तो वाकई ऐसा ही निकला। उन्होंने मुझे ढेर सारा प्यार और तोहफे दिए।
- इन अनुमानों से मैंने सीखा कि आवाज़, खुशबू और लोगों की बातों के सहारे हम अनदेखी चीज़ों की पहचान कर सकते हैं। ध्यान से सुनना और देखना ही सही अनुमान लगाने की कला है।
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