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प्रश्न
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कोई शोधकर्ता दो धातुओं A एवं B का उपयोग करके प्रकाश वैद्युत प्रभाव संबंधी प्रयोग करती है जिनके कार्य-फलन उसे ज्ञात नहीं हैं। वह A एवं B के पृष्ठों को विभिन्न आवृत्तियों के एकवर्णी विकिरणों से दीप्त करती है और संगत निरोधी विभवों (Vs) के मान अभिलेखित करती है। धातुओं A एवं B के लिए आपतित विकिरणों की आवृत्ति (v) में परिवर्तन सेनिरोधी विभव (Vs) में होने वाले परिवर्तन ग्राफ चित्र में दर्शाए गए हैं।
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निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए:
(I) ग्राफ बताता है कि A एवं B के कार्यफलन हैं: (h प्लांक नियतांक तथा e इलेक्ट्रॉन पर आवेश का मान है)
- v1 एवं v2
- V1 एवं V2
- hv1 एवं hv2
- `(h v_1)/e` एवं `(h v_2)/e`
(II) A एवं B के पृष्ठों पर आपतित विकिरण की आवृत्ति v > v2 हो तो उत्क्षिप्त इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम गतिज-ऊर्जा का मान ______
- धातु A के लिए अपेक्षाकृत अधिक होगा क्योंकि इसका कार्यफलन कम है।
- धातु B के लिए अपेक्षाकृत अधिक होगा क्योंकि इसका कार्यफलन अधिक है।
- धातु B के लिए अपेक्षाकृत अधिक होगा क्योंकि इसकी देहरी आवृत्ति का मान अधिक है।
- A और B दोनों के लिए समान होगा क्योंकि यह मान धातु के कार्यफलन पर निर्भर नहीं करता।
(III) यदि आपतित विकिरण की आवृत्ति नियत रखते हुए A और B दोनों ही धातुओं के लिए इनकी तीव्रता को दो गुना कर दिया जाए, तो ______
- समांतर रेखाओं की प्रवणता बढ़ जाएगी।
- समांतर रेखाओं की प्रवणता घट जाएगी।
- A एवं B दोनों के ही लिए देहरी आवृत्ति घट जाएगी।
- समांतर रेखाओं की प्रवणता में तो कोई अंतर नहीं पड़ेगा किंतु प्रति सेकंड अधिक इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित होंगे।
(IV) किसी धात्विक पृष्ठ के लिए देहरी आवृत्ति v0 है। यदि 3v0 आवृत्ति के विकिरण इस पृष्ठ को प्रदीप्त करें तो उत्सर्जित फोटो इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम गतिज ऊर्जा E1 है। यदि आवृत्ति को बढ़ाकर 6v0 कर दिया जाए तो फोटो इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम गतिज ऊर्जा E2 हो जाती है। `(E_1/E_2)`
- `1/3`
- `1/2`
- `2/5`
- `3/4`
माना कि धातु B के लिए ग्राफ-रेखा की प्रवणता m है। यदि e इलेक्ट्रॉन पर आवेश का मान हो, तो प्लांक के नियतांक ‘h’ के लिए व्यंजक होगा −
- m e
- `1/(m e)`
- `m/e`
- `e/m`
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उत्तर
(I) hv1 एवं hv2
स्पष्टीकरण:
देहली आवृत्ति v0 वह है जहाँ निरोधी विभव शून्य हो जाता है।
कार्य फलन (Φ) = hv0
अतः, धातु A और B के कार्य फलन hv1 और hv2 हैं।
(II) A एवं B के पृष्ठों पर आपतित विकिरण की आवृत्ति v > v2 हो तो उत्क्षिप्त इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम गतिज-ऊर्जा का मान धातु A के लिए अपेक्षाकृत अधिक होगा क्योंकि इसका कार्यफलन कम है।
स्पष्टीकरण:
प्रकाश वैद्युत समीकरण इस प्रकार दिया गया है:
Kmax = hν − Φ
समान आवृत्ति के लिए, कम कार्य फलन अधिक गतिज ऊर्जा प्रदान करता है।
ग्राफ (आलेख) से स्पष्ट है कि धातु A की देहली आवृत्ति कम है और इसका कार्य फलन भी कम है।
(III) यदि आपतित विकिरण की आवृत्ति नियत रखते हुए A और B दोनों ही धातुओं के लिए इनकी तीव्रता को दो गुना कर दिया जाए, तो समांतर रेखाओं की प्रवणता में तो कोई अंतर नहीं पड़ेगा किंतु प्रति सेकंड अधिक इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित होंगे।
स्पष्टीकरण:
निरोधी विभव और आवृत्ति के बीच के ग्राफ (आलेख) की ढाल:
ढाल = `h/e`
यह केवल मूलभूत नियतांकों पर निर्भर करती है, तीव्रता पर नहीं। तीव्रता उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों (प्रकाशिक इलेक्ट्रॉनों) की संख्या को प्रभावित करती है। अतः, ढाल अपरिवर्तित रहती है और उत्सर्जन की दर बढ़ जाती है।
(IV) `bb(2/5)`
स्पष्टीकरण:
प्रकाश विद्युत समीकरण इस प्रकार दिया गया है:
Kmax = hν − hν0
आवृत्ति 3v0 के लिए:
E1 = h(3ν0 − ν0) = 2hν0
आवृत्ति 6v0 के लिए:
E2 = h(6ν0 − ν0) = 5hν0
`E_1/E_2 = (2 h v_0)/(5 h v_0)`
= `2/5`
अथवा
m e
स्पष्टीकरण:
निरोधी विभव और आवृत्ति के बीच के ग्राफ (आलेख) से:
Vs = `h/e v - Phi/e`
ढाल (m) = `h/e`
h = m e

