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के पतिआ लए जाएत रे मोरा पिअतम पास। हिए नहि सहए असह दुख रे भेल साओन मास ।।  एकसरि भवन पिआ बिनु रे मोहि रहलो न जाए । सखि अनकर दुख दारुन रे जग के पति आए ।। मोर मन हरि हर लए गेल रे अपनों मन गेल । - Hindi (Elective)

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प्रश्न

निम्नलिखित काव्यांश की सप्रसंग व्याख्या 100 शब्दों में कीजिए।

के पतिआ लए जाएत रे मोरा पिअतम पास।
हिए नहि सहए असह दुख रे भेल साओन मास ।। 
एकसरि भवन पिआ बिनु रे मोहि रहलो न जाए ।
सखि अनकर दुख दारुन रे जग के पति आए ।।
मोर मन हरि हर लए गेल रे अपनों मन गेल ।
गोकुल तजि मधुपुर बस रे कन अपजस लेल ।।
सखि हे, कि पुछसि अनुभव मोए।
लेखन कौशल
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उत्तर

संदर्भ: यह काव्यांश मीरा बाई की रचना से लिया गया है। मीरा कृष्ण की अनन्य भक्त हैं, जिनके लिए वे अपने इष्टदेव, प्रेमी और पति सब कुछ हैं।

प्रसंग: इन पंक्तियों में मीरा अपने मन की गहन विरह वेदना व्यक्त करती हैं। वे श्रीकृष्ण से वियोग सह नहीं पातीं और उनसे मिलने की तीव्र लालसा रखती हैं।

व्याख्या: मीरा कहती हैं कि उनका मन श्रीकृष्ण के बिना एक क्षण भी नहीं रह सकता। वे अपने प्रभु के दर्शन की कामना करती हैं और कहती हैं कि संसार के लोग अपने-अपने प्रिय से मिल सकते हैं, तो मैं क्यों न मिल पाऊँ? वे कहती हैं कि उनका मन श्रीकृष्ण के प्रेम में रंगा हुआ है, और वे उनसे मिलन के बिना अधूरी हैं।

विशेष: इन पंक्तियों में मीरा के गहन प्रेम, भक्ति और विरह वेदना का अत्यंत मार्मिक चित्रण हुआ है।

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