हिंदी

अति से तो अमृत भी जहर न जाता है. इस कार पर अपने विचार प्रकट कीजिए।

Advertisements
Advertisements

प्रश्न

अति से तो अमृत भी जहर न जाता है. इस कार पर अपने विचार प्रकट कीजिए।

टिप्पणी लिखिए
Advertisements

उत्तर

अति का भला न बोलना, अति की भली न चुप। अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप। अर्थात अधिक बोलना अनेक अवसरों पर अहितकारी हो जाता है। यदि न कहने योग्य कोई बात मुँह से निकल जाए तो व्यर्थ ही झगड़े-फसाद की नौबत आ सकती है। इसी प्रकार अधिक चुप रहना, अन्याय होते देखकर भी विरोध न करना हितकर नहीं है। अधिक वर्षा होगी तो बाढ़ का प्रकोप, भूस्खलन जैसी आपदाएँ आ सकती हैं, परंतु यदि सूर्य का ताप बहुत अधिक होगा तो सूखा पड़ जाएगा। जल-स्रोत सूख जाएँगे और जीव-जंतुओं में त्राहि-त्राहि मच जाएगी। सारांश : अति का सर्वत्र त्याग करना चाहिए। प्रस्तुत परिच्छेद में यही दृष्टिगोचर होता है। मछुवे के कहने पर मछली ने उसे घर दिया। धन-दौलत, महल, राजकीय वैभव सभी कुछ दिया। पर जब मछुवी ने सूर्य, चंद्र, मेघ आदि सभी पर शासन करना चाहा तो मछली ने क्रुद्ध होकर सभी वरदान वापस ले लिए। मछुवे और मछुवी को अपनी पुरानी स्थिति में आना पड़ा। यदि मछुवी इस प्रकार अति लालच न करती तो महल छोड़कर फिर से झोंपड़ी में न रहना पड़ता। सच ही कहा गया है 'अति से तो अमृत भी जहर बन जाता है।'

shaalaa.com
गद्य (Prose) (11th Standard)
  क्या इस प्रश्न या उत्तर में कोई त्रुटि है?
अध्याय 10: महत्त्वाकांक्षा और लोभ - अभिव्यक्ति [पृष्ठ ५४]

APPEARS IN

बालभारती Hindi Yuvakbharati Standard 11 Maharashtra State Board
अध्याय 10 महत्त्वाकांक्षा और लोभ
अभिव्यक्ति | Q 1 | पृष्ठ ५४
Share
Notifications

Englishहिंदीमराठी


      Forgot password?
Use app×