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प्रश्न
अधोलिखितम् सन्दर्भप्रसङ्गाभ्यां सह व्याख्यां कुरुत।
अहो मे निरर्थकव्यापारेषु अभिनिवेशः। अहो मे मूर्खतायाः प्रकारः ......।
स्पष्ट कीजिए
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उत्तर
- सन्दर्भ: यह गद्यांश महाकवि बाणभट्ट विरचित प्रसिद्ध गद्यकाव्य ‘कादम्बरी’ (पूर्वभाग) के ‘शुकनासोपदेश’/‘चन्द्रापीड-कथा’ प्रसङ्ग से उधृत है। यह पाठ्यांश इण्टरमीडिएट संस्कृत पाठ्यक्रम के गद्य खण्ड के अन्तर्गत आता है।
- प्रसङ्ग: इस अंश में राजा तारापीड के पुत्र राजकुमार चन्द्रापीड के आत्म-चिन्तन और पश्चाताप का वर्णन है। चन्द्रापीड गन्धर्वराज चित्ररथ की पुत्री कादम्बरी के अनुपम सौन्दर्य, सरलता और असीम ऐश्वर्य को देखकर सम्मोहित हो गया है। जब वह अछोद सरोवर के तट पर या अपने निवास स्थान पर वापस लौटता है, तब वह अपनी मनःस्थिति का विश्लेषण करता है। उसे आभास होता है कि वह कादम्बरी के प्रति अत्यधिक आसक्त हो रहा है। वह स्वयं को धिक्कारते हुए अपनी इस चंचलता, भटकाव और मोह को मूर्खता मानता है।
- व्याख्या:
- अहो मे निरर्थकव्यापारेषु अभिनिवेशः।
- अर्थ: अहो! (आश्चर्य या खेद सूचक) व्यर्थ के कार्यों (या निरर्थक प्रवृत्तियों) में मेरी यह कैसी गहरी आसक्ति (झुकाव) है!
- भावार्थ: चन्द्रापीड आत्म-ग्लानि से भर जाता है। वह सोचता है कि एक होने वाले सम्राट (राजकुमार) का मुख्य कर्तव्य राजधर्म, प्रजापालन और क्षत्रिय धर्म का निर्वहन होना चाहिए। इसके विपरीत, वह एक गन्धर्व कन्या के अनुराग में डूबा हुआ है। वह कादम्बरी के हाव-भाव और चेष्टाओं का निरन्तर चिन्तन कर रहा है, जिसे वह ‘निरर्थक व्यापार’ (Meaningless pursuits) की संज्ञा देता है।
- अहो मे मूर्खतायाः प्रकारः ......।
- अर्थ: हाय! यह मेरी मूर्खता की पराकाष्ठा (या कैसा विचित्र प्रकार) है!
- भावार्थ: वह स्वयं के विवेक पर प्रश्न उठाता है। उसे लगता है कि कादम्बरी ने तो केवल अतिथि-सत्कार के नाते शिष्टाचार दिखाया था, किन्तु उसने (चन्द्रापीड ने) उसे अपने प्रति प्रेम समझ लिया। इस प्रकार बिना सोचे-समझे किसी के प्रति सम्मोहित हो जाना उसकी अपनी बुद्धिहीनता और अज्ञानता का सूचक है। यहाँ वह स्वयं को फटकारते हुए सांसारिक मोह-माया के जाल को पहचान रहा है।
- अहो मे निरर्थकव्यापारेषु अभिनिवेशः।
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