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प्रश्न
‘आ: धरती कितना देती है’ का मूल प्रतिपाद्य लिखिए। प्रस्तुत कविता द्वारा कवि ने क्या सन्देश दिया है?
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उत्तर
कवि ने अपनी प्रस्तुत कविता, “आः धरती कितना देती है” में यह संदेश दिया है कि हम जो कुछ बोलेंगे उसी तरह ही परिणाम मिलेगा। अच्छे कामों का फल अच्छा होगा, जबकि बुरे कामों का फल बुरा होगा। बीज की मणियाँ बोने से सेम फल ही निकलेंगे, लेकिन भाईचारे, ममता और समता के बीज बोने से मानवता की श्रेष्ठ फल निकलेंगे।
भूगर्भ में खनिजों और रत्नों की बहुतायत है। रत्नों का जन्म धरती से होता है। स्वार्थी व्यक्ति उसे अपनी इच्छा से भरता है। लालच में आकर पंत जी बचपन में जमीन में पैसे बो देते हैं। उस समय उन्होंने सोचा था कि पैसे बोने से पैसों का पौधा उगेगा। जब धरती से अंकुर नहीं फूटा, बाल कवि मन में धरती बंजर है। पैसों की फसल कई साल बीतने पर भी नहीं उगती है। कवि फिर घर के आँगन में मिट्टी दबा देते हैं। कवि ने कहा, “हाँ, हैं। कवि ने एक दिन संध्या के समय देखा कि सेम के अंकुर फूट गए हैं। क्रमशः ये अंकुर पत्तों से लद गए। थोड़ी देर बाद आँगन में बेल फैल गई। उन्हें तारों की तरह फूल खिलने लगे। सेम की फलियों को भी खाया।
कवि अपने अनुभव से कहते हैं कि वसुन्धरा लोगों को रत्नों की खान देती है। मनुष्य लोभ और स्वार्थ के कारण इसे बर्बाद कर रहा है। कवि ने धरती को समाज का प्रतीक बताते हुए कहा कि हमें समता और ममता के बीज बोने चाहिए।
