‘कनुप्रिया’ के ‘अमंगल छाया’ अंश में एक राधा, बदले हुए समय और परिस्थिति को समझते हुए दूसरी राधा से कहती है कि वह अब उस रास्ते पर न जाए, जहाँ से वह कभी कदंब के नीचे खड़े कृष्ण को प्रणाम करने जाया करती थी। क्योंकि अब उस मार्ग से कृष्ण की विशाल सेनाएँ गुजरेंगी, और वे राधा को पहचान नहीं पाएँगी। वह आम की शाखा भी अब काट दी जाएगी, जहाँ टिक कर कृष्ण उसके इंतज़ार में बाँसुरी बजाया करते थे, क्योंकि वह शाखा रथों की ऊँची पताकाओं में उलझती है। अब कृष्ण को राधा से जुड़े वे आत्मीय क्षण याद नहीं, उन्हें केवल महाभारत का निर्णायक युद्ध याद है। फिर भी, वह राधा इस दूसरी राधा को ढाँढस बंधाती है कि वह दुखी न हो, बल्कि गर्व करे कि उसका प्रिय अब एक महान योद्धा बन चुका है, जिसकी कमान में अठारह अक्षौहिणी सेनाएँ हैं।
यह संवाद राधा के मन के भीतर चल रहा द्वंद्व है, एक राधा जो अवचेतन मन में है और दूसरी जो वर्तमान चेतनावस्था में है। ‘अमंगल छाया’ में राधा के ये दो रूप, अतीत की स्मृतियों में खोई हुई राधा और वर्तमान यथार्थ को स्वीकारती राधा, साफ तौर पर दिखाई देते हैं।
