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कवि (साहित्यकार) के लिए अनासक्त योगी की स्थिर प्रज्ञता और विदग्ध प्रेमी का हृदय-एक साथ आवश्यक है। ऐसा विचार प्रस्तुत कर लेखक ने साहित्य-कर्म के लिए बहुत ऊँचा मानदंड निर्धारित किया है।

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प्रश्न

कवि (साहित्यकार) के लिए अनासक्त योगी की स्थिर प्रज्ञता और विदग्ध प्रेमी का हृदय-एक साथ आवश्यक है। ऐसा विचार प्रस्तुत कर लेखक ने साहित्य-कर्म के लिए बहुत ऊँचा मानदंड निर्धारित किया है। विस्तारपूर्वक समझाएँ।
सविस्तर उत्तर
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उत्तर

कवि एक अनासक्त योगी तथा विदग्ध प्रेमी की तरह होता है। वह अपने युग के समाज में रहते हुए भी समाज के आकर्षण और वैभव से प्रभावित नहीं होता। उसे सुख, भोग और ऐश्वर्य प्रिय नहीं होते, बल्कि वह इन सब आकर्षणों से दूर रहकर अपना जीवन व्यतीत करता है। वह समाज के संघर्ष, कोलाहल, उतार-चढ़ाव और कठिन परिस्थितियों से निरंतर संघर्ष करता रहता है। एक विदग्ध प्रेमी के समान वह समाज से हृदय में पीड़ा लेकर भी हमेशा उसके कल्याण के लिए कार्य करता है। सुख हो या दुख, वह किसी भी स्थिति में हार नहीं मानता और फक्कड़ स्वभाव से जीवन जीता है। जैसे संत कबीरदास जी समाज से अनासक्त रहकर विदग्ध प्रेमी की भाँति हृदय की पीड़ा सहते हुए समाज सुधार के लिए निरंतर कार्य करते रहे, उन्होंने अपने फक्कड़ स्वभाव से समाज की प्रतिकूल परिस्थितियों को भी बदलकर अनुकूल और स्वस्थ बना दिया। उसी प्रकार साहित्यकारों को भी होना चाहिए।

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शिरीष के फूल
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पाठ 14: हजारी प्रसाद द्विदेदी (शिरीष के फूल) - अभ्यास [पृष्ठ ११७]

APPEARS IN

एनसीईआरटी Hindi Aaroh Bhag 2 Class 12
पाठ 14 हजारी प्रसाद द्विदेदी (शिरीष के फूल)
अभ्यास | Q 5. | पृष्ठ ११७

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लेखक ने शिरीष को कालजयी अवधूत (संन्यासी) की तरह क्यों माना है?


हृदय की कोमलता को बचाने के लिए व्यवहार की कठोरता भी कभी-कभी ज़रूरी हो जाती है- प्रस्तुत पाठ के आधार पर स्पष्ट करें।

द्विवेदी जी ने शिरीष के माध्यम से कोलाहल व संघर्ष से भरी जीवन-स्थितियों में अविचल रह कर जिजीविषु बने रहने की सीख दी है। स्पष्ट करें।

हाय, वह अवधूत आज कहाँ है! ऐसा कहकर लेखक ने आत्मबल पर देह-बल के वर्चस्व की वर्तमान सभ्यता के संकट की ओर संकेत किया है। कैसे?

सर्वग्रासी काल की मार से बचते हुए वही दीर्घजीवी हो सकता है, जिसने अपने व्यवहार में जड़ता छोड़कर नित बदल रही स्थितियों में निरंतर अपनी गतिशीलता बनाए रखी है। पाठ के आधार पर स्पष्ट करें।

आशय स्पष्ट कीजिए-

दुरंत प्राणधारा और सर्वव्यापक कालाग्नि का संघर्ष निरंतर चल रहा है। मूर्ख समझते हैं कि जहाँ बने हैं, वहीं देर तक बने रहें तो कालदेवता की आँख बचा पाएँगे। भोले हैं वे। हिलते-डुलते रहो, स्थान बदलते रहो, आगे की ओर मुँह किए रहो तो कोड़े की मार से बच भी सकते हो। जमे कि मरे।


आशय स्पष्ट कीजिए-

जो कवि अनासक्त नहीं रह सका, जो फक्कड़ नहीं बन सका, जो किए-कराए का लेख-जोखा मिलाने में उलझ गया, वह भी क्या कवि है?..... मैं कहता हूँ कवि बनना है मेरे दोस्तो, तो फक्कड़ बनो।


आशय स्पष्ट कीजिए-

फूल हो या पेड़, वह अपने-आप में समाप्त नहीं है। वह किसी अन्य वस्तु को दिखाने के लिए उठी हुई अँगुली है। वह इशारा है।


शिरीष के पुष्प को शीतपुष्प भी कहा जाता है। ज्येष्ठ माह की प्रचंड गरमी में फूलने वाले फूल को शीतपुष्प संज्ञा किस आधार पर दी गई होगी?

कोमल और कठोर दोनों भाव किस प्रकार गांधीजी के व्यक्तित्व की विशेषता बन गए।


आजकल अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में भारतीय फूलों की बहुत माँग है। बहुत से किसान साग-सब्ज़ी व अन्न उत्पादन छोड़ फूलों की खेती को ओर आकर्षित हो रहे हैं। इसी मुद्दे को विषय बनाते हुए वाद-विवाद प्रतियोगिता का आयोजन करें।

हज़ारी प्रसाद द्विवेदी ने इस पाठ की तरह ही वनस्पतियों के संदर्भ में कई व्यक्तित्त्व व्यंजक ललित निबंध और भी लिखे हैं- कुटज, आम फिर बौरा गए, अशोक के फूल, देवदारु आदि। शिक्षक की सहायता से इन्हें ढूँढ़िए और पढ़िए।

द्विवेदी जी की वनस्पतियों में ऐसी रुचि का क्या कारण हो सकता है? आज साहित्यिक रचना-फलक पर प्रकृति की उपस्थिति न्यून से न्यून होती जा रही है। तब ऐसी रचनाओं का महत्त्व बढ़ गया है। प्रकृति के प्रति आपका दृष्टिकोण रुचिपूर्ण है या उपेक्षामय? इसका मूल्यांकन करें।

दस दिन फूले और फिर खंखड़-खंखड़ इस लोकोक्ति से मिलते-जुलते कई वाक्यांश पाठ में हैं। उन्हें छाँट कर लिखें।


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अशोक वृक्ष- भारतीय साहित्य में बहुचर्चित एक सदाबहार वृक्ष। इसके पत्ते आम के पत्तों से मिलते हैं। वसंत-ऋतु में इसके फूल लाल-लाल गुच्छों के रूप में आते हैं। इसे कामदेव के पाँच पुष्पवाणों में एक माना गया है। इसके फल सेम की तरह होते हैं। इसके सांस्कृतिक महत्त्व का अच्छा चित्रण हज़ारी प्रसाद द्विवेदी ने निबंध अशोक के फूल में किया है। भ्रमवश आज एक दूसरे वृक्ष को अशोक कहा जाता रहा है और मूल पेड़ (जिसका वानस्पतिक नाम सराका इंडिका है।) को लोक भूल गए हैं। इसकी एक जाति श्वेत फूलों वाली भी होती है।
अरिष्ठ वृक्ष- रीठा नामक वृक्ष। इसके पत्ते चमकीले हरे होते हैं। फल को सुखाकर उसके छिलके का चूर्ण बनाया जाता है, बाल धोने एवं कपड़े साफ करने के काम में आता है। पेड़ की डालियों व तने पर जगह-जगह काँटे उभरे होते हैं, जो बाल और कपड़े धोने के काम भी आता है।


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आरग्वध वृक्ष- लोक में उसे अमलतास कहा जाता है। भीषण गरमी की दशा में जब इसका पड़े पत्रहीन ठूँठ सा हो जाता है, पर इस पर पीले-पीले पुष्प गुच्छे लटके हुए मनोहर दृश्य उपस्थित करते हैं। इसके फल लगभग एक डेढ़ फुट के बेलनाकार होते हैं जिसमें कठोर बीज होते हैं।


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शिरीष वृक्ष- लोक में सिरिस नाम से मशूहर पर एक मैदानी इलाके का वृक्ष है। आकार में विशाल होता है पर पत्ते बहुत छोटे-छोटे होते हैं। इसके फूलों में पंखुड़ियों की जगह रेशे-रेशे होते हैं।


निम्नलिखित प्रश्न को ध्यानपूर्वक पढ़कर प्रश्न के लगभग 60 शब्दों में उत्तर दीजिए :-

शिरीष के फूल निबंध में अवधूत रूप के रूप में लेखक ने किस महात्मा को याद किया है और क्यों?


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