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“जो मिलता है, अपने श्रम से उतना भर ले लेते हैं” पक्षी अपनी आवश्यकता भर ही संचय करते हैं। मनुष्य का स्वभाव इससे भिन्न कैसे है?

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प्रश्न

“जो मिलता है, अपने श्रम से उतना भर ले लेते हैं” पक्षी अपनी आवश्यकता भर ही संचय करते हैं। मनुष्य का स्वभाव इससे भिन्न कैसे है?

सविस्तर उत्तर
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उत्तर

पक्षी अपने श्रम से जो कुछ मिलता है, उतना ही ग्रहण करते हैं। उनके मन में लोभ नहीं होता। जो कुछ बच जाता है, उसे वे दूसरों के हित के लिए छोड़ देते हैं। अर्थात वे केवल अपनी आवश्यकता भर ही संचय करते हैं और संतोषी जीवन जीते हैं।

मनुष्य का स्वभाव इसके बिल्कुल विपरीत है। मनुष्य स्वार्थी और लालची होता है। वह अपनी आवश्यकता से कहीं अधिक धन और वस्तुएँ इकट्ठा करना चाहता है। उसके मन में जग का सारा माल हड़प लेने की चाह रहती है। वह अपनी कमाई से ही नहीं, बल्कि दूसरों के हिस्से का धन भी हड़पकर अपना घर भरना चाहता है। उसे इस बात की परवाह नहीं होती कि दूसरों का क्या होगा। इसी लोभ-लालच के कारण मनुष्य में कभी संतोष नहीं रहता, जबकि पक्षी थोड़े में ही संतुष्ट रहकर सुखी रहते हैं।

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पाठ 9: चिड़िया - पाठ से [पृष्ठ १२०]

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एनसीईआरटी Hindi Malhar Class 7
पाठ 9 चिड़िया
पाठ से | Q (ख) | पृष्ठ १२०
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